- गुरु की झोली में जो था वो सर्वस्व विश्व में नवमुनियों के हाथों बांट दिया
- 37 वर्षो बाद परतापुर में सांसारिक मोह माया से विरक्त होकर 5 उत्कृष्ट श्रावक श्राविका ने अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज से ली जिनेश्वरी दीक्षा


कोडरमा/परतापुर(राजस्थान) । साधना महोदधी अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज के कर कमलों से उत्कर्ष श्रावक श्राविका को जिनेश्वरी दीक्षा प्रदान की गई। ओर एक आर्यका माता जी को गणीय पद प्राप्त हुआ। इन 5 उत्कर्ष श्रावक श्राविका ने संसार से विरक्ति का भाव लिए मुक्ति के मार्ग का अनुसरण किया। इस दीक्षा कार्यक्रम का निर्देशन उपाध्याय मुनि 108 श्री पीयूष सागर महाराज एवं ब्रह्मचारी तरुण भैया के नेतृत्व में हुआ प्रतिष्ठाचार्य ने सभी पूजा विधान को संपन्न कराया ।
दीक्षा विधि के प्रारंभ में समाज परिवार एवं सभी संतो की अनुमति लेकर आचार्य श्री ने अपने आत्म हितंकर तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी महाराज, आचार्य शांतिसागर महाराज, आचार्य विमल सागर महाराज, आचार्य विद्यासागर जी महाराज,आचार्य संभव सागर महाराज, आचार्य पुष्पदंत सागर महाराज सहित गुरुओं की वंदना कर मंच पर आसीन चतुर्विध संघ के साथ धार्मिक क्रिया वह मंत्र उच्चारण के साथ दीक्षार्थी श्रावक श्राविका की केश लोचन की क्रिया को संपन्न किया। जब केश लोचन की क्रिया हुई तो हर कोई इसे देख भावुक नजर आया स्वयं के हाथों केशलोचन कोई सहज कार्य नहीं है वह भी बिना किसी औजार के जैन दर्शन में कैशलोच तप साधना है। केशलौच की क्रिया सम्पन्न होने के बाद आचार्य श्री के द्वारा दीक्षा के संस्कार कर आवश्यक नियमों के संकल्प दिलाकर उन्हें सन्यास के मार्ग पर दीक्षित करते हुए उनके नवीन नामों की घोषणा की। नामों की घोषणा होने के बाद उपस्थित समुदाय जय-जय कारों की जय घोष से गुंजायमान हो गया। दीक्षा के बाद सभी श्रमण दीक्षार्थियो ने गुरुदेव की मंगल आशीष ली। इस अवसर पर अन्तर्मना ने कहा कि समय ने ऐसा प्रसंग प्रस्तुत कर दिया कि अपने गुरु से मैने परतापुर में दीक्षा लिया ।वही आज मुझे दीक्षा देने का सौभाग्य दीक्षा भूमि में मिला।
इस अवसर पर बोलते हुए आचार्य श्री ने कहा कि दीक्षा स्वयं के द्वारा स्वयं की परीक्षा है। जैन संत जिह्वा से ज्यादा अपने जीवन को प्रभावित करता है। इसीलिए भगवान महावीर ने इसे मार्ग कठिन और दुर्लभ कहा है।
उन्होंने कहा सांसारिक कई व्यक्ति साधु बन सकते हैं दिगंबर जैन संत प्रकृति का जीवन जीते हैं इसलिए नग्न रहते हैं। न स्नान, न वस्त्र, ना बर्तनों में भोजन, ना सोने को बिस्तर, ना रहने को झोपड़ी, न बैठने को गाड़ी। उन्होने कहा दिगम्बर जैन संत तो 2 से 4 माह के बीच अपने सर के बाल और दाढ़ी-मूछ को अपने हाथों से उखाड़ते है। शरीर और इन्द्रियों से ममत्व भाव कम करने के लिए और अपने वैराग्य भाव को दृढ़ करनेके लिए अपने लक्ष्य को पाने के लिए केशलोचन क्रिया करते हैं।
इन सब कार्य को आत्मसात कर अपने गुरु आज्ञा का व जैन धर्म का तन मन से पालन करनेवाले ऊर्जावान व्यक्तिव जेनेश्वरी दीक्षा को प्राप्त करता है। बह्मचारी अवस्था से क्षुल्लक दीक्षा तक नियमों में कुछ छूट होती है। जिन्हें उच्च पद मिलते ही समाप्तकर दिया जाता है। साथ ही क्षुलिका व माता जी साध्वियों के लिए भी धर्मानुसार नियम होते हैं। जिनका उन्हें पालन करना होता है।गौरतलब है कि अकल्पनीय तप साधना के मध्य भी अपने संघस्थ साधु के प्रति वात्सल्य भावका निर्वाह करते हैं।
नव दीक्षित संघ
संजय भैया जी –
मुनि श्री 108 सामायिक सागरजी महाराज जी
क्षुल्लक अर्घ सागर जी-मुनि श्री 108 अर्घ सागरजी महाराज जी
आर्यीका 105 श्री ज्ञानप्रभा माताजी-गणीय आर्यक 105 ज्ञान प्रभा माता जी
क्षुल्लिका धर्म प्रभा माता जी-आर्यीका 105 श्री धर्मप्रभा माताजी
कनक दीदी-क्षुलिका 105 श्री द्रब्यप्रभा माताजी
सुशीला दीदी-क्षुलिका 105 श्री भावप्रभा माताजी
एक विलक्षण क्षण जो सिर्फ जैन धर्म मै देखने मिल सकता है.
“37 वर्ष पूर्व जिनसे धर्म-पुत्र का पावन संबंध बना था, दीक्षा के माता बनने का गौरव मिला था..(श्रीमती सुशीला पंचोली )
आज उसी धर्म-पुत्र(अंतर्मना) के आशीर्वाद में क्षुल्लिका दीक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला— यह एक विलक्षण और अत्यंत भावुक कर देने वाला संयोग बना है।”
समय ने 37 साल बाद वही रिश्ता पूरा किया—धर्म-पुत्र से मिली क्षुल्लिका दीक्षा।”
अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज गुरुदेव सह संघ 🏔️ परतापुर (राजस्थान) 🛕 मैं विराजमान है… । उक्त जानकारी जैन राज कुमार अजमेरा कोडरमा मीडिया प्रभारी,ओर मनीष जैन सेठी ने दी।