“जैसा कर्म, वैसा फल” – मुनि श्री निर्णय सागर जी का प्रभावशाली संदेश

रतलाम के श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में प्रवचन, कर्म सिद्धांत, वैराग्य और आत्मकल्याण पर विस्तृत मार्गदर्शन

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रतलाम । शहर के स्टेशन रोड स्थित श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा का आयोजन किया गया, जिसमें मुनि श्री 108 श्री निर्णय सागर जी महाराज ने अपने ओजस्वी और प्रेरणादायक प्रवचन से श्रद्धालुओं को धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा दी। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने शांतिपूर्वक प्रवचन का श्रवण किया।
मुनिश्री ने अपने प्रवचन की शुरुआत करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसका सही उपयोग तभी संभव है जब व्यक्ति अपने विचार, वाणी और कर्म को शुद्ध रखे। उन्होंने कहा कि अच्छे कार्यों में स्वयं को समर्पित करना ही सच्चा धर्म है। व्यक्ति को अपने मन, बुद्धि और व्यवहार को निरंतर सुधारते रहना चाहिए, क्योंकि यही आत्मोन्नति का मार्ग है।
उन्होंने कर्म सिद्धांत की विस्तार से व्याख्या करते हुए कहा कि शुभ भावों और सत्कर्मों से पुण्य का अर्जन होता है, जबकि अशुभ भावों से पाप का बंधन होता है। “जैसा करोगे वैसा ही पाओगे” — इस सिद्धांत को समझाते हुए उन्होंने बताया कि जीवन में मिलने वाले सुख और दुख हमारे अपने ही कर्मों का परिणाम हैं। इसलिए किसी भी परिस्थिति में दूसरों को दोष देने के बजाय आत्मचिंतन करना आवश्यक है।
प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने एक प्रेरणादायक कथा सुनाई, जिसने श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया। कथा में एक ऐसे बालक का वर्णन था, जिसके जन्म के समय ही ज्योतिषियों ने उसके द्वारा कुल-नाश होने की संभावना व्यक्त की थी। इस भविष्यवाणी से भयभीत होकर परिवार ने कई प्रयास किए, यहां तक कि बालक को समाप्त करने का भी प्रयास किया गया। किन्तु नियति को कौन टाल सकता है — बालक जीवित बच गया और विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से पुनः उसी परिवार से जुड़ गया।
मुनिश्री ने इस कथा के माध्यम से समझाया कि जो कर्म पहले किए जा चुके हैं, उनका फल अवश्य मिलता है और उसे कोई भी टाल नहीं सकता। मनुष्य कितने ही उपाय क्यों न कर ले, लेकिन कर्म का सिद्धांत अटल और अटूट है। इसलिए हमें बुरे कर्म करने से बचना चाहिए और सदैव शुभ कर्मों में प्रवृत्त रहना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि संसार में “मेरा-तेरा” का भाव ही समस्त दुखों का मूल कारण है। जब यह शरीर ही स्थायी नहीं है, तो धन, परिवार और अन्य संबंधों को अपना मानना केवल मोह है। यही मोह व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र में बांधे रखता है। उन्होंने कहा कि वास्तविक सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और आत्मज्ञान में है।
मुनिश्री ने आत्मकल्याण की ओर प्रेरित करते हुए कहा कि व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने जीवन का लक्ष्य केवल सांसारिक उपलब्धियों तक सीमित न रखे, बल्कि आत्मिक उन्नति की दिशा में भी प्रयास करे। संयम, साधना और सत्संग के माध्यम से ही आत्मा का विकास संभव है।
प्रवचन के अंत में उन्होंने उपस्थित जनसमूह को संदेश दिया कि जीवन में धर्म को अपनाएं, अहिंसा, सत्य और संयम के मार्ग पर चलें तथा अपने कर्मों को शुद्ध बनाकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ें। धर्मसभा के पश्चात श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के चरणों में वंदना कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

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