
लेखक – डॉ यतीश जैन
भारतीय अध्यात्म के इतिहास में श्रीमद् राजचंद्र का नाम अत्यंत श्रद्धा, आदर और गौरव के साथ लिया जाता है। वे केवल जैन धर्म के महान दार्शनिक, आत्मज्ञानी संत और साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि आधुनिक भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण के प्रमुख प्रेरणास्रोत भी थे। उन्होंने अल्पायु में ही अपने आत्मानुभव, गहन चिंतन और सरल जीवन के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया कि आत्मा की अनुभूति ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। सत्य, अहिंसा, करुणा, क्षमा, अपरिग्रह और आत्मशुद्धि पर आधारित उनका दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके जीवनकाल में था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी उन्हें अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक स्वीकार करते हुए कहा था कि उनके जीवन पर जिन तीन व्यक्तियों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा, उनमें श्रीमद् राजचंद्र का स्थान सर्वोपरि था।
श्रीमद् राजचंद्र का जन्म 9 नवम्बर 1867 को गुजरात के मोरबी जिले के वावाणिया ग्राम में हुआ। उनका मूल नाम रायचंदभाई रवजीभाई मेहता था। पिता रवजीभाई एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे और माता देवबाई धार्मिक संस्कारों से संपन्न थीं। बचपन से ही उनमें विलक्षण प्रतिभा, अद्भुत स्मरणशक्ति तथा आध्यात्मिक जिज्ञासा दिखाई देने लगी थी। कहा जाता है कि बाल्यावस्था में ही उन्हें पूर्वजन्म का स्मरण हो गया था, जिससे उनके भीतर वैराग्य और आत्मचिंतन की भावना और अधिक प्रबल हुई। वे शतावधान की अद्भुत कला में निपुण थे, जिसमें एक साथ अनेक प्रश्नों, संख्याओं और तथ्यों को स्मरण रखकर उनका क्रमबद्ध उत्तर देना पड़ता है। इस असाधारण क्षमता ने उन्हें कम आयु में ही पूरे भारत में प्रसिद्ध कर दिया।
यद्यपि वे गृहस्थ जीवन में रहे और व्यापार भी करते थे, किंतु उनका मन सदैव आत्मकल्याण, सत्य की खोज और आध्यात्मिक साधना में रमा रहता था। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि मोक्ष केवल संन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि गृहस्थ भी आत्मसंयम, सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के माध्यम से आत्मोन्नति प्राप्त कर सकते हैं। उनका जीवन इस सत्य का जीवंत उदाहरण था कि संसार में रहते हुए भी व्यक्ति आत्मा की ओर उन्मुख रह सकता है।
श्रीमद् राजचंद्र ने अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें आत्मसिद्धि शास्त्र सर्वाधिक प्रसिद्ध है। केवल 142 पदों में रचित यह कृति आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष और सद्गुरु के स्वरूप का अत्यंत सरल, तर्कसंगत और अनुभवपरक विवेचन प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त मोक्षमाला, भावनाबोध, अपूर्व अवसर तथा उनके पत्र आज भी आध्यात्मिक साधकों के लिए अमूल्य मार्गदर्शक माने जाते हैं। उनकी लेखनी में दार्शनिक गहराई के साथ-साथ अनुभव की प्रामाणिकता और भाषा की सहजता का अद्भुत समन्वय मिलता है।
महात्मा गांधी के जीवन में श्रीमद् राजचंद्र का विशेष स्थान रहा। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए गांधीजी ने धर्म, आत्मा, ईश्वर, सत्य और अहिंसा से संबंधित अनेक जिज्ञासाएँ उन्हें पत्रों के माध्यम से भेजीं। श्रीमद् राजचंद्र ने अत्यंत स्पष्ट, तर्कपूर्ण और आध्यात्मिक उत्तर देकर गांधीजी के मन की शंकाओं का समाधान किया। गांधीजी ने स्वीकार किया कि सत्य और अहिंसा के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलने की प्रेरणा उन्हें श्रीमद् राजचंद्र से मिली। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की नैतिक आधारशिला के निर्माण में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
श्रीमद् राजचंद्र का संपूर्ण जीवन आत्मानुभूति की साधना, करुणा, अहिंसा, सत्य और वैराग्य का अनुपम उदाहरण है। वे मानते थे कि वास्तविक धर्म बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, सदाचार और समत्व में निहित है। उन्होंने अनेकांतवाद, सहिष्णुता और सभी जीवों के प्रति करुणा का संदेश दिया, जो आज के तनावपूर्ण और हिंसाग्रस्त विश्व में अत्यंत प्रासंगिक है।
केवल 33 वर्ष की अल्पायु में 9 अप्रैल 1901 को उनका देहावसान हो गया, किंतु उनका आध्यात्मिक प्रकाश आज भी करोड़ों लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है। उनकी वाणी, साहित्य और जीवनदर्शन मानवता के लिए अमूल्य धरोहर हैं। वे भारतीय संस्कृति के उन अमर महापुरुषों में हैं जिन्होंने आत्मज्ञान को जीवन का सर्वोच्च आदर्श बनाया और सत्य तथा अहिंसा के माध्यम से विश्व को शांति, करुणा और आत्मोन्नति का मार्ग दिखाया। भारतीय अध्यात्म के आकाश में श्रीमद् राजचंद्र का व्यक्तित्व एक ऐसे ध्रुवतारे के समान है, जिसकी ज्योति युगों-युगों तक मानवता का पथ आलोकित करती रहेगी।