


आज भी विश्वास करना कठिन लगता है कि पूज्य गणाचार्य श्री 108 विरागसागर जी महाराज हमारे बीच देह रूप में नहीं रहे। उनके समाधि दिवस पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए बीते वर्षो इंदौर नगर में संसघ चातुर्मास के दिनों की स्मृतियाँ बार-बार मानस पटल पर उभर आती हैं। वरिष्ठ समाजसेवी डॉ जैनेन्द्र जैन ने कहा कि उनकी वात्सल्यपूर्ण दृष्टि, सरलता और स्नेहिल व्यवहार आज भी इंदौर जैन समाज एवं छत्रपति नगर समाज की स्मृतियों में जीवंत हैं। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि 4 जुलाई 23 की प्रातः लगभग 2:30 बजे, जब हमे फोन के माध्यम से यह हृदय विदारक समाचार प्राप्त हुआ कि—पूज्य गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज ने सल्लेखनापूर्वक समाधि धारण कर अपनी देह का परित्याग कर दिया है।
तो कुछ क्षणों तक तो विश्वास ही नहीं हुआ। डॉ जैनेन्द्र जैन ने कहा कि श्रंमण संस्कृति के महाश्रमण गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज केवल एक महान संत ही नहीं थे, वे संयम, साधना, गुरु-भक्ति, करुणा वात्सल्य और आत्मकल्याण की सजीव प्रतिमूर्ति थे। उनका संपूर्ण जीवन जैन धर्म के आदर्शों का अनुपम उदाहरण रहा। उन्होंने अनगिनत आत्माओं को धर्ममार्ग पर अग्रसर किया और अपना आत्म कल्याण करने के इच्छुक सैकड़ो भव्य आत्माओं को दीक्षा देकर समाज को पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जैसे श्रेष्ठ साधु समाज को दिए।
उनके समाधि दिवस पर उनके चरणों में कोटिश: वंदन करते हुए यही प्रार्थना है कि हम सभी उनके द्वारा बताए मार्ग पर चलते हुए अपना मोक्ष मार्ग प्रशस्त करें।
गणाचार्य श्री 108 , इसविरागसागर जी महाराज के श्रीचरणों में विनम्र श्रद्धासुमन।
शत-शत नमन! कोटिशः वंदन!