
रतलाम 10 जुलाई। “संसार में वास्तविक सुख नहीं, केवल सुख का आभास है। बिना मांगे जो मिले वह आनंद है और आनंद की आधारशिला सिर्फ धर्म है। हमारे मन के आनंद को हमसे कोई नहीं छीन सकता।” यह मंगलमय संदेश परम पूज्या महासती वर्धमान आयम्बिल तपोनिधि श्री प्रफुल्ला श्री जी म.सा. ने स्टेशन रोड पर जैन स्थानक मे धर्मसभा को संबोधित करते हुए फरमाया।
महासती जी ने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझाते हुए कहा कि तीन तरह के व्यक्ति हमेशा दारिद्रता का अभिशाप पाते हैं—पहला आलसी, दूसरा क्रोधी और तीसरा अपने ही बुरे कर्मों का मारा। उन्होंने ऋतुओं का उदाहरण देते हुए कहा कि ठंड, गर्मी या बारिश, हर ऋतु में कोई न कोई कमी होती है। सबसे श्रेष्ठ ऋतु तो केवल ‘पुण्य और धर्म की ऋतु’ है। ”अगर पुण्य बलवान है, तो गर्मी में एसी-पंखा और ठंड में हीटर व गर्म पकवान जैसी समस्त सुविधाएं स्वतः मिल जाती हैं। इसके विपरीत, पुण्य की कमी हो तो बरसात में छप्पर उड़ने और चिलचिलाती धूप में पसीना बहाने का कष्ट भोगना पड़ता है। जिसकी पुण्यवानी जागृत है, उसके लिए हर ऋतु सुखदायी है।” महासती जी ने तप की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संसार के अन्य सभी तप भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए हो सकते हैं, लेकिन शाश्वत ओलीजी और सिद्धि तप आत्मा की शुद्धि के परम साधन हैं।. सिद्धि तप आत्मा के सिद्ध-बुद्ध होने तक साथ रहता है। उन्होंने चातुर्मास के दौरान अधिक से अधिक संख्या में श्रावक- श्राविकाओं को मन के आनंद के लिए सिद्धि तप करने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर द्विशतावधानी पूज्या श्री महिमा श्री जी म.सा. ने फरमाया कि संसार में दो प्रकार की प्यास कभी समाप्त नहीं होती—एक तन की प्यास और दूसरी मन व धन की प्यास। यह हमेशा बढ़ती ही जाती है। पूज्या श्री ने आह्वान किया कि हमें इस चातुर्मास में धन की प्यास छोड़कर आत्मा की प्यास को जगाना होगा। धन की प्यास जहां जीव को दुर्गति की ओर ले जाती है, वहीं आत्मा की प्यास सद्गति और आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
महासती जी ठाणा का आगामी प्रवास काटजू नगर में होने जा रहा है। दिनांक ११ जुलाई को महासती जी का काटजू नगर जैन उपाश्रय पर मंगल पदार्पण होगा। दिनांक ११ एवं १२ जुलाई को प्रातः ०९:०० बजे से १०:०० बजे तक पूज्या श्री के विशेष प्रवचनों का लाभ धर्मप्रेमी बंधुओं को मिलेगा। श्री संघ ने सभी धर्मावलंबियों से समय पर पधारकर धर्मलाभ लेने का आग्रह किया है।