
रतलाम 12 जुलाई । स्थानीय शान्तिनगर कॉलोनी में आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला के तहत पूज्या प्रफुल्ला श्री जी महाराज साहब ने श्रद्धालुओं को शास्त्रों में वर्णित तीन महत्वपूर्ण सूत्रों—क्रिया, परिणाम और विवेक की गूढ़ व्याख्या करते हुए जीवन को सही दिशा देने का मार्ग दिखाया।
(1) क्रिया ए कर्म (जैसी क्रिया, वैसा कर्म)
पूज्या श्री जी ने फरमाया कि हम जैसा कार्य (क्रिया) करते हैं, वैसा ही हमारा कर्म बनता है। अच्छी क्रिया से अच्छे कर्म और बुरी क्रिया से बुरे कर्म का सृजन होता है। लेकिन केवल क्रिया ही पर्याप्त नहीं है, उसके पीछे के भाव सबसे महत्वपूर्ण हैं।
(2) परिणाम ए बंध (भावों से ही होता है कर्म का बंध)
प्रवचन में बताया गया कि क्रिया करते समय मन में जो भावना, लेश्या या गुणस्थान होते हैं, उसे ‘परिणाम’ कहते हैं। इसी से अच्छे-बुरे कर्म बंधते हैं।
खंदक मुनि का दृष्टांत: पूज्या श्री जी ने खंदक मुनि का उदाहरण देते हुए कहा कि पूर्व भव में काँचरा छीलते समय ‘मेरे जैसा कोई छिलका नहीं उतार सकता’ का अहंकार युक्त भाव आने के कारण अनजाने में ही ऐसा कर्म बंध गया कि मुनि भव में उनकी खुद की खाल उधेड़ी गई।
भावना का खेल: यदि कोई व्यक्ति ‘तेला’ (तप) जैसी अच्छी क्रिया करे, लेकिन मन में पड़ोसी का अहित करने की भावना रखे, तो वह बुरे कर्म का ही बंध करेगा। इसी तरह, प्रवचन में बैठा व्यक्ति यदि फिल्म के बारे में सोचे तो वह ‘आश्रव’ (कर्म का आना) करता है, जबकि फिल्म देखते हुए पछतावा करने वाला व्यक्ति मन के शुभ परिणामों से ‘संवर’ (कर्मों को रोकना) कर लेता है। इसलिए मन के परिणामों को हमेशा शुद्ध रखना चाहिए।
(3) विवेक ए धर्म (विवेक ही धर्म है)
पूज्या श्री जी ने स्पष्ट किया कि जहाँ विवेक नहीं, वहाँ धर्म नहीं हो सकता।
गाय के बछड़े का उदाहरण: यदि कोई व्यक्ति प्यासे बछड़े को पानी पिलाने के बाद यह सोचे कि कल मैं पानी नहीं पिला पाया तो यह मर जाएगा, और इस डर से उसे पानी के होद में ही डाल दे, तो यहाँ विवेक न होने से धर्म भी अधर्म में बदल जाता है।
पारिवारिक कर्तव्य: यदि कोई बहू स्थानक में आकर तीन-तीन सामायिक तो कर रही है, लेकिन घर पर उसकी वृद्ध व बीमार सास बिना सहारे खड़ी भी नहीं हो पा रही है, तो ऐसी सामायिक में विवेक नहीं है। बिना विवेक के किया गया धर्म फलदायी नहीं होता।
वैर की अनंतानुबंधी गाँठ बिगाड़ती है परलोक की गति: पूज्या महती श्री जी म.सा.
इसी श्रृंखला में पूज्या श्री महती जी महाराज साहब ने फरमाया कि किसी के प्रति मन में रखी गई वैर की अनंतानुबंधी गाँठ हमारे वर्तमान की शांति, अंत समय की समाधि और परलोक की गति को बिगाड़ देती है। उन्होंने बुद्धि के चार प्रकारों पर प्रकाश डाला:
कुपित बुद्धि: जो कुछ समय के लिए भ्रष्ट होती है और फिर सामान्य हो जाती है। संसार के हर प्राणी में यह पाई जाती है।
कुत्सित बुद्धि: इसमें वैर की भावना भव-भव तक चलती है और व्यक्ति हमेशा दूसरों का बुरा चाहता है।
कुंठित बुद्धि: इसमें मन में क्षमा के भाव तो होते हैं, लेकिन अहंकार के कारण व्यक्ति न तो क्षमा मांग पाता है और न कर पाता है।
कर्तव्य बुद्धि: सोच-समझकर अपने कर्तव्य का पालन करना, बड़ों से क्षमा माँगना और छोटों को क्षमा करना ही कर्तव्य बुद्धि है। जब तक जीवन में कर्तव्य बुद्धि नहीं आएगी, तब तक वैर की गाँठें नहीं खुल सकतीं।
आगामी कार्यक्रम और स्थिरता:
संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि आगामी १३ और १४ जुलाई को पूज्या महासती जी ठाणा की स्थिरता शान्तिनगर कॉलोनी में ही रहेगी। दोनों दिन प्रातः ०९:०० से १०:०० बजे तक पूज्या श्री जी के अमृतमयी प्रवचन होंगे। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएँ उपस्थित होकर धर्मलाभ ले रहे हैं।