कहीं तुम सिकंदर तो नहीं? – आचार्य प्रसन्नसागर जी महाराज

निमियाघाट । अहिंसा संस्कार पदयात्रा के प्रणेता साधना महोदधि भारत गौरव
उभय मासोपासी आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज निमियाघाट के सहस्त्र वर्ष पुरानी भगवान पारसनाथ की वरदानी छांव तले विश्व हितांकर विघ्न हरण चिंतामणि पारसनाथ जिनेंद्र महाअर्चना महोत्सव पर भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए।
अंतर्मना प्रसन्नसागरजी* ने कहा – मनुष्य जीवन दुर्लभ है अत: जिंदगी के बेशकीमती लम्हे व्यर्थ मत जाने दीजिए यह जिंदगी अमानत है सावधान रहिए चित्त की चौकशी ही परम ज्योति को पाने का द्वार है अभी तुम महज एक पत्थर हो परमात्मा के घटते ही सब पत्थर प्रतिमाएं बन जाते हैं तुम प्रतिमा बन सकते हो क्योंकि तुम में प्रभु बनने की प्रतिभा है प्रभु बनना है तो मन को माजना पड़ेगा केवल तन को माजना पर्याप्त नहीं है तन को क्या माजना वह तो यूं ही मिटने वाला है अथवा छूटने वाला है मन को मंझो तो कोई बहादुरी है तुम अपने मन को ऐसे माँझते हो जैसे गज स्नान मतलब हाथी सरोवर में नहाता है और बाहर निकलकर धूल में फिर लौट जाता है मन को इतना माँझो कि स्वयं का प्रतिबिंब झलक जाए मन को मांजने वाला ही राम,कृष्ण,बुद्ध महावीर,परमहंस बन पाते हैं सिकंदर सदी के विश्व विजेता इस पृथ्वी पर बहुत हुए लेकिन मन के किले को फतेह करने वाले महावीर बहुत कम हुए सिकंदर विश्व विजय का प्रतीक है तो महावीर आत्मविजय के प्रतीक हैं सिकंदर और महावीर में इतना ही अंतर है कि एक विश्व विजेता है लेकिन स्वयं से हारा है दूसरा आत्म विजेता है मगर विश्व का मसीहा है जो जाग गया वह महावीर हो गया जो जाग ना पाया सोए सोए जिया और सोए सोए मर गया वह सिकंदर बन गया सोया हुआ आदमी सिकंदर ही होता है कहीं आप सिकंदर ही तो नहीं हैं ।
अंतर्मना प्रसन्नसागर जी महाराज ने कहा 44 दिवसीय जिनेंद्र महाअर्चना हमारे घर,परिवार,समाज देश,राष्ट्र के संकटों से मुक्त कराने की अच्छी पहल है मीडिया प्रभारी कोडरमा राज कुमार अजमेरा, नवीन जैन उक्त जानकारी दी ।