रतलाम,04 सितंबर। भगवान श्री कृष्ण का जेल में जन्म हुआ, तो ताले टूट गए। वे जहाँ भी रहे आनंद में रहे। इसका ही नाम है सौभाग्य। सौभाग्य जिसका भी होता है, वह कष्ट आने पर कभी घबराता नहीं, बल्कि आगे बढ़ता रहता है। वासुदेव श्री कृष्ण का जीवन सारी विशेषताओं से परिपूर्ण रहा, वे सर्वोच्च पुण्य के धनी थे।
यह बात रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी मसा निर्भय ने कही। मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में प्रवचन देते हुए मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य प्रवर्तकश्री ने कहा कि वासुदेव कृष्ण के मन में किसी के प्रति भी बैर नही था। उन्होंने कई युद्ध अकेले लड़े। असीम शक्ति होने के बाद भी उनमें क्षमा का गुण था। उन्होंने शिशुपाल का भी 100 अपराध क्षमा करने पर नहीं माना, तो वध किया। वे दुर्योधन की सभा में शांतिदूत बनकर गए। जबकि वे चाहते, तो कठोर आदेश कर सकते थे, युद्ध नहीं होगा और दुर्योधन को 5 गांव देने पड़ेंगे। उसकी सभा में शांति से समझाने जाने पर उनका अपमान हुआ तो उन्हांेने सहन किया। जहाँ जैसी योग्य स्थिति होती है, उन्होंने उसका वैसा ही निर्वहन किया।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि वासुदेव कृष्ण धर्म की क्रिया नहीं करते, पर धर्म को जीतते है और जो धर्म को जीतता है वही तीर्थंकर बन सकता है। मनुष्य का पुण्य सदैव पूजा जाता है। इसलिए कर्म निर्जरा के लिए साधना करो, इससे पुण्य अपने आप आ जाएगा। धर्म करते हुए जो पुण्य आता है, वही धर्म से जोड़ता है। अन्य पुण्य संसार के साधन देते है। लेकिन आत्मा की चिंता करने वाला उनके फेर में नहीं पडता। वह धर्म से जोडने वाले पुण्य की प्राप्ति को ही अपना लक्ष्य बनाता है।
उन्होंने कहा कि वासुदेव कृष्ण ने हाथी, सांड, पूतना, दो मल्ल, कालिया नाग को जीतकर कषायों को हराने का संदेश दिया है। उनकी दो मल्ल को जीत राग-द्वेष जीतने, कालिया नाग को वश में करना क्रोध को वश में करने, हाथी को वश में करना लोभ पर विजय, पूतना का अन्त कर माया और सांड पर विजय मान पर जीत का प्रतीक है। शिशुपाल को 100 बार क्षमा करना क्षमा का उत्कृष्ठ उदाहरण है, जो सबकों सोचने पर मजबूर करता है कि हमने कितनी बार किसी को क्षमा किया ? वासुदेव कृष्ण का जीवन संदेशों से भरा है। उनसे प्रेरणा लेकर सभी अपने जीवन का कल्याण कर सकते है।
प्रवचन के आरंभ में उपप्रर्वतनी, महासती, प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ने संबोधित किया। उनके साथ ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी मसा एवं सेवाभावी श्री कल्पनाजी मसा, एवं श्री दर्शनमुनिजी मसा मंचासीन रहे। प्रवचन के दौरान श्री धर्मदास जैन श्री संघ सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे। संचालन आयुष गंग द्वारा किया गया।