1000 से अधिक आकृतियों से साकार की श्रीकृष्ण की संपूर्ण जीवन लीला

70 वर्षीय गोपाल माहेश्वरी की तीन माह की अथक मेहनत, सिलाई से लेकर डिजाइन और श्रृंगार तक सब कुछ स्वयं किया

रतलाम। योजनाबद्ध किए गए कार्य अक्सर सफलता की ओर ले जाते हैं, लेकिन जब किसी कार्य में श्रद्धा, भावना, समर्पण और ईश्वर की कृपा जुड़ जाए तो असंभव सा लगने वाला कार्य भी सहजता से पूर्ण हो जाता है। रतलाम के जवाहर नगर निवासी 70 वर्षीय श्री गोपाल माहेश्वरी ने अपनी इसी आस्था और समर्पण से एक ऐसी अनोखी हस्तनिर्मित झांकी तैयार की है, जो इन दिनों लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर तैयार की गई इस झांकी में 1000 से अधिक हस्तनिर्मित आकृतियों के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर उनकी बाल लीलाओं, गोकुल-वृंदावन की लीलाओं, गोवर्धन धारण, कंस वध सहित जीवन के विभिन्न प्रसंगों को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया है। एक ही झांकी में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की संपूर्ण यात्रा को दर्शाने का यह प्रयास अपने आप में अनूठा है।
इस विशाल झांकी को तैयार करने में गोपाल माहेश्वरी ने लगभग तीन माह तक अथक मेहनत की। खास बात यह है कि झांकी में उपयोग होने वाली अधिकांश सामग्री और पात्रों के वस्त्र, मुकुट, आभूषण एवं श्रृंगार सामग्री उन्होंने अपने हाथों से तैयार की है। सिलाई से लेकर डिजाइन और सजावट तक का कार्य स्वयं करते हुए उन्होंने हर छोटी-बड़ी बारीकी का विशेष ध्यान रखा।
श्री माहेश्वरी बताते हैं कि पिछले करीब चार वर्षों से उन्हें श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर झांकी सजाने का सौभाग्य मिल रहा है। हालांकि झांकी बनाने का उनका अनुभव करीब 7-8 वर्षों पुराना है। शुरुआत में उन्होंने छोटे-छोटे नंद भवन और गोवर्धन पर्वत जैसी झांकियां बनाईं। लॉकडाउन के दौरान मिली एक छोटी सी प्रेरणा धीरे-धीरे उनके लिए प्रभु सेवा का माध्यम बन गई। सबसे पहले उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की पोशाक बनाना शुरू किया और धीरे-धीरे यह कार्य विस्तृत होता गया।
वे भावुक होकर कहते हैं, “यह कार्य मैंने नहीं चुना, बल्कि मेरे प्रभु ने मुझे चुना है। मैं तो केवल एक माध्यम हूं। सजाने वाले हाथ मेरे हैं, लेकिन कल्पना और भावना सब उसी मुरलीवाले की है।”
गोपाल माहेश्वरी के इस सेवाभाव में उनकी जीवनसंगिनी श्रीमती मंजुला माहेश्वरी, बेटा-बहू, बेटी और नाती-पोते भी हरसंभव सहयोग करते हैं। परिवार उन्हें लगातार प्रोत्साहित करता है कि वे प्रभु की इस सेवा को निरंतर जारी रखें। उनका एक पुत्र ऑस्ट्रेलिया में चार्टर्ड अकाउंटेंट है। पुत्र का कहना है कि “पिताजी, आपके जीवन में जो अच्छा लगे और जिससे आपको खुशी मिले, वह करते रहिए।” यही प्रोत्साहन गोपाल माहेश्वरी के लिए प्रेरणा बना हुआ है।
वे अपनी इस पूरी साधना का श्रेय भी स्वयं को नहीं, बल्कि “मेरे ठाकुरजी की कृपा” को देते हैं। उनका कहना है कि जब झांकी पूर्ण होती है और कान्हा मुस्कुराते हुए अपने सिंहासन पर विराजते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे जीवन का हर पल धन्य हो गया।
गोपाल माहेश्वरी की यह झांकी केवल सजावट नहीं, बल्कि श्रद्धा, कला, कल्पना, मेहनत और प्रभु के प्रति समर्पण का अद्भुत संगम है। झांकी देखने पहुंच रहे लोग भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं के साथ-साथ इसे तैयार करने वाले 70 वर्षीय कलाकार की लगन और भक्ति की भी सराहना कर रहे हैं।
श्री माहेश्वरी अंत में बस यही प्रार्थना करते हैं—
“हे प्रभु, बस इतनी कृपा बनाए रखना कि जीवनभर आपके चरणों की यह छोटी सी सेवा करता रहूं। जय श्री कृष्ण, जय श्री राधे कृष्ण।”

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