

इंदौर 13 सितंबर (राजेश जैन दद्दू) । मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने दलाल बाग देशना मंडप में कहा कि भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के संस्थापक नहीं हैं। जैन धर्म अनादि-अनंत और शाश्वत है। भगवान महावीर ने इस धर्म को धारण किया, जिया और जगत को इसका सद् मार्ग दिखाया, इसलिए वे इस धर्म के महान प्रचारक हैं। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि रविवारीय धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे।
गुरु देव ने कहा कि हम भगवान महावीर की महिमा तो गाते हैं, लेकिन आवश्यकता उनके संदेश को जीवन में आत्मसात करने की है। मंदिर जाना औपचारिकता नहीं होना चाहिए। मंदिर से लौटते समय पुनः दर्शन का संकल्प लेकर आना चाहिए। आज स्थिति यह है कि मंदिर आते समय समय तय होता है और लौटने की जल्दी रहती है। इस मानसिकता को बदलना होगा।
श्री सम्मेद शिखरजी का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि तीर्थयात्रा को पर्यटन न समझें। तीर्थ आत्मा को मोक्ष दिशा देने वाला स्थान है। यदि मन में पहले से ही लौटने का भाव है, तो यात्रा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को चिंतन करना चाहिए कि उसका वास्तविक घर और वास्तविक पिता कौन है। सांसारिक माता-पिता पूज्य हैं, लेकिन आत्मा के लक्ष्य की दृष्टि से जिनेंद्र भगवान ही परम आश्रय हैं। जैन होना केवल जन्म की पहचान नहीं, बल्कि एक बड़ी आध्यात्मिक जिम्मेदारी है। जिनेंद्र भगवान के मार्ग को जीवन में धारण करना ही जैनत्व की सार्थकता है। मंदिर और तीर्थयात्रा को परंपरा नहीं, आत्मचिंतन और जीवन परिवर्तन का माध्यम बनाएं।
धर्मसभा में परम संरक्षक भरत मोदी, चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन आनंद गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोशी, महामंत्री हर्ष जैन, आलोक आकाश कोल प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, श्रीमती मुक्ता जैन, सोनाली बागढीया सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित थे।