
ऋषभोदय तीर्थ/दिल्ली 14 सितंबर (राजेश जैन दद्दू)। पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा में कहा कि सुखद, आनंदमय मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है। जीवन को शांतिपूर्ण बनाना है तो पाप का क्षय करो और पुण्य को वर्धमान करो। जिसका प्रबल पुण्य होता है उसकी सब व्यवस्था बन जाती है और जिसका पुण्य क्षीण होता है उसे घर में भी भूखा रहना पड़ता है।
महाराज श्री ने कहा, विवेकी सज्जनों को संकट आने पर भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। बड़े-बड़े महापुरुषों पर भी संकट आए हैं, पर प्रज्ञजन उपसर्गों में भी अपनी सूझ-बूझ से उत्कर्ष को प्राप्त कर लेते हैं।
नीतिज्ञ की जीत –
नीतिज्ञ उचित समय पर ही बोलते हैं, व्यर्थ में समय व्यय नहीं करते। जीवन में ऊँचाई प्राप्त करनी है तो हमेशा विवेकपूर्वक निर्णय करें। विवेक शून्य कार्य दुःखद होता है। सोचो-समझो फिर कार्य करो।
सच्चा ज्ञानी कौन –
शास्त्रों का ज्ञान भिन्न है और आत्म ज्ञान भिन्न है। शब्द ज्ञानी होना श्रेष्ठ नहीं, आत्म ज्ञानी होना सर्वश्रेष्ठ है। सच्चा आत्म ज्ञानी संयम के साथ जीवन जीता है। कोरे ज्ञान से क्या लाभ? जो हाथ में जलता दीपक लेकर भी खाई में गिर जाए उसका ज्ञान किस काम का? ज्ञान वही श्रेष्ठ है जिससे तत्व बोध हो, संयम पर आस्था हो, आत्म कल्याण की दृष्टि हो और दया, करुणा, क्षमा, परोपकार की भावना हो।
अच्छे लोग, अच्छी दृष्टि –
महापुरुषों की दृष्टि विशाल होती है। श्रेष्ठ पुरुष जाति, पंथ, संप्रदाय, रूढ़ियों और क्रियाकांडों के पक्षपात से परे समदृष्टि सम्पन्न होता है। पुण्य क्षीण को वरदान फलित नहीं होते और पुण्यात्मा को श्राप नहीं लगता। आयु पूर्ण होने पर कोई औषधि, तंत्र-मंत्र काम नहीं आते।
सच्ची श्रद्धा से बड़ा कुछ नहीं और मिथ्या मान्यता से बड़ा अहितकारी कुछ नहीं। पाप ही शत्रु है, धर्म ही मित्र है। पुण्य प्राप्त कर भोग भोगोगे तो दुर्गति होगी और पुण्योदय पर धर्म करोगे तो सिद्धि होगी, मुक्ति का द्वार खुलेगा। जिस साधक के हृदय में शत्रु-मित्र, जीवन-मरण, लाभ-अलाभ, काँच-कंचन, स्तुति-निंदा और सुख-दुःख में समता भाव हो वही श्रेष्ठ है। समता ही साधुता है।