मान महा-विषरूप, मार्दव अमृत स्वरूप – पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी महाराज

इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । पर्वाधिराज पर्युषण के पावन अवसर पर श्रावक संस्कार शिविर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिगम्बर जैन धर्म के पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा कि – धर्म ही मंगल है, धर्म ही उत्तम है, धर्म ही शरण है और धर्म ही परम सुख-शांति का उपाय है। संसार-सागर से पार होने के लिए धर्म जहाज के समान है और तारने वाले निर्ग्रन्थ गुरु हैं।

अहंकार छोड़ो, नम्रता धारण करो –
महाराज जी ने कहा कि अहंकार, मान कषाय है। मान के अभाव होने पर ही ‘मार्दव’ धर्म प्रकट होता है। छल, कपट और मान नरक के द्वार पर ले जाते हैं। अहंकारी, मानी जीव निश्चित ही मरण कर नरकादि दुर्गतियों को प्राप्त करता है।
उन्होंने कहा – नारकी में क्रोध कषाय, तिर्यंचों में माया कषाय, देवों में लोभ कषाय और मानवों में मान कषाय की प्रधानता होती है। मानी व्यक्ति सर्वनाश स्वीकार कर लेता है, पर झुकना स्वीकार नहीं करता। यही उसकी सबसे बड़ी दुर्गति का कारण है।

झुकेगा वही, उठेगा –
गुरुदेव ने कहा – जो झुकता है, वही गगन में उठता है। ऊँचाइयाँ प्राप्त करना है तो झुकना सीखो। विनय मानव-जीवन का श्रृंगार है। जो विनय से झुकना सीख लेता है, उसकी दुनिया विनय करती है। विनय से शत्रु भी प्रसन्न हो जाता है। विनय करने वाला त्रिलोक में प्रसिद्धि प्राप्त करता है।
नम्रता, सरलता गुरुजनों की मूल विद्या है, जबकि अहंकार दुष्टता का चिन्ह है। जो नम्रता है, वही मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ बनाती है।

कौन प्रिय? कौन अप्रिय –
महाराज जी ने समझाया कि जो हमारे राग की पुष्टि करता है, वह हमें अच्छा लगता है और जिससे राग की पुष्टि नहीं होती, वह प्रिय नहीं लगता। वस्तु तो जैसी है वैसी ही है, न वह सुंदर है न असुंदर। प्रिय लगने पर दोष भी नहीं दिखते और अप्रिय के गुण भी छुप जाते हैं। यह सब राग का खेल है।

राग आग है, वीतराग भाव शीतल नीर है –
राग की एक चिंगारी जीवन को अशांत कर देती है। दुनिया में जितने भी अनर्थ हुए हैं, हो रहे हैं और भविष्य में होंगे, वे सभी रागियों के कारण ही होंगे। राग के वशीभूत मानव संचित पुण्य को नष्ट कर पाप में प्रवृत्त होकर संसार में भ्रमण करता है। राग अंधा होता है, रागी हित-अहित का विचार नहीं कर पाता। इसलिए राग छोड़ो, वैराग्य पथ पर चढ़ो। वीतराग भाव ही कल्याणकारी है। अंत में उन्होंने कहा – सरलता मानव जीवन का आभूषण है। क्षमा आनंद की जननी है। विनय सुख का आधार है। अहंकार, मान, मद विनाशकारी हैं, मार्दव धर्म हितकारी है।

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