ध्यान योगी , तप मूर्ति आचार्य श्री शिवमुनि जी के पावन जन्म दिवस पर कोटिशः वंदन, अभिनंदन

लेखक – विजय कुमार लोढ़ा, निम्बाहेड़ा

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट ध्यान योगी, तपसूर्य जो पिछले 27 वर्षों से श्रमण संघ का नेतृत्व कर रहे है । आज जीवन के 85 वें वर्ष में प्रवेश कर रहे है।

संक्षिप्त जीवन वृत

18 सितम्बर1942 को माता विद्यादेवी की कुक्षी से गांव रानिया जो कि पंजाब हरियाणा बार्डर पर स्थित हे वहा हुआ। पिताश्री का नाम श्री चिरंजी लाल जी जैन जिनका परिवार बहुत ही संभ्रात व धनाढ़य था ! पांच वर्ष की वय मे स्कूल में पढ़ने गये कुशाग्र बुद्धि के कारण हर कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया! तेरह वर्ष की अवस्था में ही धर्म के प्रति विशेष लगाव व साधु संतो के प्रति जुड़ाव रहा ,! आपका पेतृक व्यवसाय मलोट मंडी पंजाब मे था आपको व्यवसाय के लिए अबोहर भेजा पर आपका मन नही लगा ! अध्ययन में आपकी विशेष रुचि रही!, दर्शनशास्त्र व इंगलीश में आपने डबल एम. ए किया! अध्ययन रत रहते आप 54 दिवसीय विदेश यात्रा पर गये तथा वहा के वातावरण को पूरी तरह देखा अन्दर का वेराग्य और प्रबल हो गया तथा 17 मई 72 को आपने आचार्य सम्राट श्री आत्मा राम जी म.सा के सुशिष्य राष्ट्रसंत श्री ज्ञान मुनि जी के पास मलोटमंडी ( पंजाब) में भागवती दीक्षा ग्रहण की!आपके साथ आपकी बहिन ने भी दीक्षा ली। दीक्षा लेने के बाद आगम का गहन अध्ययन किया तथा ध्यान साधना जीवन का मूलमंत्र बनाया। जिस समय आपने दीक्षा ली चर्चा का विषय रहा कि इतने पढ़े लिखे व बहुत बड़े धनाढ़य व्यक्ति के व संभ्रात परिवार के लड़के ने दीक्षा ली।
आपकी प्रतिभा का दिग्दर्शन संयम लेने के कुछ समय बाद ही होने लगा था। आपका सन 1985 का चातुर्मास जोधपुर था तब आप दो संत ही थे तब जैन दिवाकर परम्परा के दो संत घोरतपस्वी श्री अभय मुनिजी म.सा. ठा. 2 आपके साथ चातुर्मास हेतु जोधपुर पधारे थे। सन 1986 के अप्रेल माह मे उपाध्याय श्री केवल मुनि जी म.सा के उपाध्याय पद चादर महोत्सव मे भाग लेने आप इन्दोर पधारे थे! उस समय से शिवमुनि जी को युवाचार्य बनाया जाए यह चर्चा चलने लगी थी!

पूना साधु सम्मेलन मे युवाचार्य पद की घोषणा
13 मई 1987 को पूना के साधु सम्मेलन में आचार्य सम्राट श्री आनन्द रिषी जी म.सा के मुखारविन्द से श्री देवेन्द्र मुनि जी म.सा को उपाचार्य पद पर एवम डा. शिव मुनिजी को युवाचार्य पद की घोषणा की गइ । जब आपको युवाचार्य बनाया गया तब आपकी दीक्षा पर्याय मात्र 15 वर्ष ही थी।

जून 1999 में आचार्य पद पर विराजमान
आचार्य प्रवर श्री देवेन्द्र मुनि जी के देवलोक गमन होने के बाद जून 1999 मे आप अहमदनगर में आचार्य पद पर विराजमान हुए एवम 7 मइ 2001को आपका आचार्य पद चादर महोत्सव दिल्ली में आयोजित किया गया। तब से आप श्रमण संघ का नेतृत्व करते आरहे है!आप 41वर्षो से लगातार वर्षीतप आराधना कर रहे है( हो सकता हे कुछ गिनती मे मेरे से कुछ गल्ती संभव हे)। हजारो शिविर लगाकर लाखों लोगो को ध्यान साधना से जोड़ा हे तथा यह अनवरत चल रहा हे! जीवन मे उदारवादी सोच के साथ , सह मंगल मेत्री के साथ आपका मिशन आगे बढ़ रहा है ! जीवन मे किस प्रकार के संस्कार हो, जीवन में धर्म का स्वरूप क्या हो , ध्यान जीवन को गहराइयो से किस तरह जुड़ा हे यह आपके प्रवचन के मुख्य बिन्दु होते है ! साहित्य के क्षेत्र मे भी आपने उल्लेखनीय कार्य किया है !सन 2015 मे आपके पावन सानिध्य में इन्दौर मे वृहद् साधु सम्मेलन हुआ जिसमें आपने श्री महेन्द्र रिषी जी म.सा. को युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया हे!
एसे हमारे आचार्य सम्राट , ध्यानयोगी, तपसूर्य, आदि कई उपमाओ से अलंकृत आचार्य डा. शिव मुनि जी के पावन चरण सरोजो में हृदय की अनन्य आस्था के साथ वंदन, अभिनंदन, आपका नेतृत्व सदा श्रमण संघ को मिलता रहे! आज के दिन एक बात जो मेरे हृदय में आचार्य श्री के प्रति हे वो लिखे बिना नही रह सकता जब आचार्य प्रवर 1985 का जोधपुर का चातुर्मास पूर्ण कर इन्दोर की तरफ पधार रहे थे ,दो ही संत थे निम्बाहेड़ा से नयागांव जो लगभग 11 कि.मी हे! विहार मे पैदल साथ रहा उस समय आप किसी पद पर नंही थे! पर सन 2015 में याने 30 वर्ष बाद आपका निम्बाहेड़ा पधारना हुआ जब इन्दोर साधु सम्मेलन के लिए जारहे थे उन्होने यह शब्द कहे:-मे निम्बाहेड़ा के विजय लोढ़ा जी को जानता हूं जो मे 30 साल पहले आया था मेरे को विहार कराया वह पूरी सभा में कही ,! सभा का संचालन मे कर रहा था मेरी आंखे भर आइ कि वाह आचार्य श्री आप धन्य हो कि एक छोटे से कार्यकर्ता को अभी तक स्मृति पटल पर रखा है! धन्य हो, धन्य हो
आपकी कृपा संघ पर , समाजपर इसही तरह बरसती रहे!

चरण रज
विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा( राज.)
न्यासी अ. भा. श्री जैन दिवाकर संगठन समिती रजि.
मंत्री: श्री जैन दिवाकर साहित्य प्रकाशन समिती चतुर्थ जैन वृद्धाश्रम दुर्ग चितोडगढ़( राज.)

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