शुद्ध को अशुद्ध न करना ही उत्तम शौच धर्म की सच्ची साधना – मुनिपुंगव सुधासागर जी

इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । 10 लक्षण महापर्व के चौथे दिन शनिवार को दलाल बाग स्थित विद्या सुधा देशना मंडप में चल रहे 10 दिवसीय श्रावक संस्कार शिविर में निर्यापक मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने उत्तम शौच धर्म की गहन व्याख्या करते हुए कहा – शौच धर्म केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि मन, वचन, शरीर और आचरण की शुद्धता है। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि गुरु देव ने शिवराथियो एवं समाज जन को संबोधित करते हुए कहा कि
स्वयं अशुद्ध रहना पाप नहीं, पर शुद्ध को अशुद्ध करना बड़ा पाप है –
गुरुदेव ने कहा – > “स्वयं अशुद्ध रह जाना उतना बड़ा पाप नहीं है, जितना किसी शुद्ध को अपने कारण अशुद्ध कर देना।”
जीवन में निमित्त बहुत प्रभावशाली होते हैं। स्वयं गलत करना कमजोरी हो सकती है, लेकिन दूसरे को गलत मार्ग पर ले जाना गंभीर कर्मबंध का कारण है।

तीर्थ की पवित्रता हमारी जिम्मेदारी –
सम्मेद शिखरजी, गिरनार जैसे सिद्ध क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए कहा – “वंदना करें या न करें, लेकिन तीर्थ को अपने कारण अपवित्र मत करें।” पवित्र पर्वत पर थूकना, गंदगी करना, कचरा फैलाना तीर्थ की मर्यादा भंग करता है। शारीरिक क्षमता न हो तो नीचे से ही नमस्कार कर सकते हैं, पर वंदना के नाम पर पवित्रता भंग नहीं करें।

भारतीय संस्कृति और जैन समाज की प्रतिष्ठा भी शौच धर्म है –
महाराज जी ने कहा कोई भी गलत कार्य करने से पहले सोचो – “कहीं मेरे कारण भारत देश और भारतीय संस्कृति पर कलंक तो नहीं आएगा?” संयम, शाकाहार, अहिंसा और मर्यादा हमारी संस्कृति की पहचान है।

प्रत्येक जैन को सोचना चाहिए – “मेरे कारण पूरी जैन जाति बदनाम तो नहीं हो रही?” आचरण ऐसा हो कि लोग कहें – “जैन धर्म के संस्कार आज भी जीवित हैं।”

कुल, परिवार और शिविर का भी शौच धर्म –
पिता का शौच धर्म है कि संतान को शर्मिंदा न होना पड़े, संतान का धर्म है कि माता-पिता का सिर न झुके। बच्चे उपदेश से कम, आचरण से अधिक सीखते हैं।
शिविर में आना ही पर्याप्त नहीं, शिविर के संस्कारों को जीवन में उतारना आवश्यक है। इंदौर समाज शिविरार्थियों को श्रद्धा से देख रहा है। आचरण ऐसा हो कि बस में बैठे तो लोग कहें यह शिविरार्थियों की बस है, पंडाल में बैठे तो कहें यह शिविरार्थियों का पंडाल है।

इंद्रियों का शौच धर्म –
आँख का शौच – बुरी दृष्टि न देखना।
कान का शौच – निंदा और अश्लीलता न सुनना।
मुँह का शौच – नशा, गुटखा और अपशब्द से बचना।
पेट का शौच – शिविर के सात्विक भोजन के बाद गलत खान-पान पर न जाना।
मन और वाणी का शौच – ईर्ष्या, द्वेष और कटु वचन से बचना।
“यह अब सामान्य आँखें नहीं, शिविरार्थी की आँखें हैं। यह सामान्य कान नहीं, गुरु वाणी सुन चुके कान हैं।”

धर्म को स्वार्थ का साधन न बनाओ – अपने गलत कार्यों की सफलता के लिए भगवान, गुरु या धर्म का नाम लेना धर्म को कलंकित करना है।
अंत में गुरुदेव ने संकल्प दिलाया – “मैं स्वयं शुद्ध रहूँगा और अपने कारण किसी तीर्थ, धर्म, परिवार, समाज और संस्कृति की पवित्रता को अशुद्ध नहीं होने दूँगा।” धर्मसभा में हजारों शिविरार्थी एवं समाज श्रेष्ठी सपना मनीष गोधा आनंद नवीन गोधा हर्ष जैन आलोक आकाश कोल हुक्म काका अक्षय कासलीवाल संजय पाटोदी डॉ जैनेन्द्र जैन विरेन्द्र जैन विपुल बाझलं अरविंद अखिलेश सोधीया नरेंद्र राकेश नायक विजय धुर्रा एवं श्रीमती मुक्ता जैन, रानी डोसी उपस्थित थे।

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