संतों का सान्निध्य, सत्संग और स्वाध्याय ही जीवन को कल्याण के मार्ग पर ले जाते हैं






रतलाम । स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव का शनिवार को संत सम्मेलन एवं महाप्रसादी के साथ समापन हुआ। श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ के समापन अवसर पर निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सान्निध्य में आयोजित संत सम्मेलन में देश के विभिन्न क्षेत्रों से संत-महामंडलेश्वरों ने सहभागिता कर श्रद्धालुओं को आशीर्वचन प्रदान किए।
संत सम्मेलन में महामंडलेश्वर स्वामी श्री हितेश्वरानंद जी महाराज (उदयपुर), महामंडलेश्वर स्वामी प्रभुतानंद जी महाराज चित्रकूट , स्वामी रामानंद जी महाराज इंदौर, स्वामी निर्गुणानंद जी महाराज धार, निर्गुण आनंद जी महाराज धार, स्वामी वेदानंद जी महाराज उज्जैन, स्वामी आत्मानंद जी महाराज रतलाम, स्वामी शिवानंद जी महाराज सुजापुर , स्वामी श्री मनीषानंद जी महाराज बांसवाड़ा, योगीनाथ जैठाना, महंत प्रहलाद दास जी रूप नगर फंटा सहित अनेक संतों का पावन सान्निध्य रहा।
संतों ने दिया एकता, समरसता और सनातन संस्कृति का संदेश
संत सम्मेलन में संतों ने गुरु परंपरा, चातुर्मास के महत्व, सनातन धर्म, सामाजिक समरसता, सदाचार और आध्यात्मिक जीवन पर वेदोक्त विचार रखे। संतों ने कहा कि जीवन में सत्संग और संतों का सान्निध्य मनुष्य को संस्कारित एवं कल्याणकारी जीवन की दिशा प्रदान करता है। संतों के विचारों तथा शास्त्रों का श्रवण-मनन कर उन्हें अपने आचरण में उतारना ही जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग है।
संतों ने कहा कि कलियुग में भगवान के नाम-स्मरण और भक्ति को जीवन का आधार बनाकर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक कर सकता है। समाज में ऊंच-नीच, भेदभाव और वैमनस्य को त्यागकर सामाजिक समरसता, नैतिक आदर्श और मानवीय मूल्यों को अपनाना आवश्यक है। सत्य, सेवा, सदाचार और सद्भावना को जीवन का आधार बनाते हुए छल-कपट, ईर्ष्या, अहंकार एवं नकारात्मक प्रवृत्तियों से दूर रहने का संदेश भी दिया गया।
आधुनिकता के साथ संस्कार और संस्कृति का समन्वय जरूरी
संतों ने कहा कि आधुनिकता को अपनाना आवश्यक है, लेकिन ऐसी आधुनिकता नहीं होनी चाहिए जो जीवन में अशांति, तनाव और बिखराव उत्पन्न करे। आधुनिकता के साथ संस्कार, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों का समन्वय ही जीवन को सुखी, संतुलित और सार्थक बना सकता है। उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय से नियमित रूप से सत्संग एवं स्वाध्याय से जुड़ने, संतों का सान्निध्य प्राप्त करने तथा सेवा, सदाचार और समरसता को जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
84 लाख योनियों से मुक्ति का उपाय गुरु की आज्ञा का पालन
चातुर्मास के दौरान दिए गए संदेश का उल्लेख करते हुए संतों ने कहा कि शास्त्रों में 84 लाख योनियों की बात कही गई है। इससे बचने और मानव जीवन को सार्थक बनाने के लिए गुरु की आज्ञा एवं मार्गदर्शन का पालन करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि गुरु जो करने के लिए कहें, उसे जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। चातुर्मास के दौरान जो भी संदेश दिया गया, वह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संत परंपरा और वेदों की शिक्षाओं पर आधारित है।
रतलामवासियों को मिला लंबे समय तक संत सान्निध्य का लाभ
संतों ने कहा कि रतलाम की पावन धरा का यह परम सौभाग्य रहा कि महानिर्वाणी अखाड़े के पीठाधीश्वर परम पूज्य आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी भारती का चातुर्मास यहां संपन्न हुआ। चातुर्मास के दौरान रतलामवासियों को लंबे समय तक स्वाध्याय, कथा, सत्संग और संत सान्निध्य का लाभ प्राप्त हुआ। संतों के सान्निध्य और शास्त्रों के अध्ययन के इस संगम से जनमानस को आध्यात्मिक आनंद एवं आत्मिक शांति का अनुभव हुआ।उपस्थित संतों ने अखंड ज्ञान आश्रम के श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर देवस्वरूपानंद जी महाराज के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन एवं नेतृत्व में रतलाम को संत परंपरा, सत्संग और आध्यात्मिक आयोजनों का यह अवसर प्राप्त हुआ।
संतों का किया सम्मान, बड़ी संख्या में श्रद्धालु हुए शामिल
संत सम्मेलन के दौरान आश्रम से जुड़े कार्यकर्ताओं एवं श्रद्धालुओं ने संत-महात्माओं का दुपट्टा एवं पुष्पमाला पहनाकर सम्मान किया। संतों ने भी आश्रम से जुड़े कार्यकर्ताओं का अभिनंदन कर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। संत सम्मेलन के पश्चात आरती संपन्न हुई, जिसके बाद महाप्रसादी एवं भंडारे का आयोजन किया गया।
समापन अवसर पर आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु, भक्तजन, महिलाएं एवं पुरुष उपस्थित रहे। दिव्य चातुर्मास महोत्सव के दौरान आयोजित विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक एवं कथा आयोजनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म, अध्यात्म और सनातन संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिला।