भेद विज्ञान ही जीवन की सही दिशा है, भय से अभय की ओर ले जाता है धर्म – मुनिश्री सुधासागर जी महाराज

इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । दलाल बाग स्थित विद्या सुधा देशना मंडप में आज आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने भेद विज्ञान, बाल संस्कार, अनुशासन और सम्यग्दर्शन पर गहन अमृतवाणी प्रदान की। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि मुनिश्री ने कहा कि संसार में सबसे दुर्लभ वस्तु भेद विज्ञान है। भेद विज्ञान का अर्थ है – क्या मेरे लिए हितकारी है और क्या अहितकारी। मनुष्य को अपने जीवन में कभी न कभी यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए कि मेरा जन्म क्यों हुआ, मुझे यह मानव जीवन क्यों मिला, मेरा जन्म जैन कुल में क्यों हुआ और मुझे धर्म, संस्कार व अच्छे परिवार का वातावरण क्यों मिला। दुर्भाग्य से हम इन प्रश्नों पर विचार ही नहीं करते।

जो अच्छा लगता है, वह हमेशा हितकारी नहीं –
गुरुवर ने बालक के उदाहरण से समझाया कि बच्चे को जो अच्छा लगता है, वह जरूरी नहीं कि उसके लिए अच्छा भी हो। बच्चा मिट्टी को अच्छा समझ सकता है, लेकिन माँ उसे खाने से रोकती है। यहीं से इच्छा और विवेक का संघर्ष शुरू होता है। इसलिए बच्चे को केवल यह कहना कि “यह मत करो” पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे समझाना आवश्यक है कि क्यों मत करो, क्या सही है और क्या गलत है। यही भेद विज्ञान है।
अनुशासन हो, लेकिन विवेक के साथ –
मुनिश्री ने कहा कि बच्चे की हर इच्छा पूरी कर देना प्रेम नहीं है और हर बात पर केवल डाँटना भी संस्कार नहीं है। सच्चा संस्कार वह है जिसमें गलत से रोकने के साथ-साथ सही का कारण भी समझाया जाए। जब किसी व्यक्ति को केवल डर के कारण रोका जाता है, तो वह वही कार्य छिपकर, झूठ बोलकर करने लगता है। इसलिए सुधार बाहरी नियंत्रण से नहीं, अंदर के विवेक से होना चाहिए।

सबसे बड़ा संदेश –
मुनिश्री ने कहा – “जिस कार्य को करते समय अपने लोगों से डरना पड़े, जिसे छिपाना पड़े या जिसके लिए झूठ बोलना पड़े, उस कार्य पर एक बार अवश्य विचार करना चाहिए।” हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या मैं जो कर रहा हूँ, उसे अपने माता-पिता, गुरु और भगवान के सामने कर सकता हूँ? यदि उत्तर नहीं आता है तो अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए।
भगवान के चरण वह स्थान हैं जहाँ संसार के भय समाप्त होने चाहिए। वहाँ जाकर मनुष्य को निःशंक और निर्भय होना चाहिए। यदि भगवान से ही भय लगने लगे तो भीतर झाँकना चाहिए। सच्चे देव, शास्त्र, गुरु में श्रद्धा के साथ जीवन की दिशा बदलना ही सम्यग्दर्शन की ओर बढ़ना है और सम्यग्दृष्टि की पहचान निःशंकितता है।
मुनिश्री ने कहा जहाँ विवेक है, वहाँ भेद विज्ञान है, जहाँ भेद विज्ञान है वहाँ सही दिशा है, जहाँ सम्यग्दर्शन है वहाँ निःशंकता है और जहाँ निःशंकता है वहाँ आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
धर्मसभा में प्रमुख रूप से चक्रवर्ती सपना मनीष गोधा, आनंद नवीन गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, संजय पाटोदी, हुकुमचंद जैन काका, अक्षय कासलीवाल, धर्मेन्द्र जैन, डॉ जैनेन्द्र जैन गिरीश जैन गिन्नी, ब्रह्मचारी सुनील भैया,पारस भैया प्रदीप भैया विजय धुर्रा सौरभ बड़जात्या, संजय सामरिया, राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।

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