
इंदौर। दलालबाग स्थित विद्या सुधा देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा में मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने धर्म के वास्तविक स्वरूप पर आत्ममंथन कराने वाली अमृतवाणी दी।
मुनिश्री ने कहा कि आज मंदिरों में भीड़ है, पूजा-पाठ, व्रत, स्वाध्याय और धार्मिक आयोजन भी हो रहे हैं, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि “मैं धर्म किस भाव से कर रहा हूँ? मैं धर्म कर रहा हूँ या वास्तव में धर्मात्मा बन रहा हूँ?” केवल धार्मिक क्रियाएँ कर लेना पर्याप्त नहीं है।
भगवान से सौदा नहीं, समर्पण चाहिए –
उन्होंने कहा कि यदि भगवान को इच्छा पूर्ति, संकट दूर करने, व्यापार में सफलता या बीमारी से मुक्ति का माध्यम बना लिया गया, तो यह भक्ति नहीं, स्वार्थ बन जाती है। सच्चा भक्त भगवान से यह नहीं कहता कि मेरी इच्छा पूरी कर दीजिए, बल्कि उसका भाव होना चाहिए कि “हे भगवान! आपकी इच्छा में मेरी इच्छा मिल जाए।” गुरु का आशीर्वाद चमत्कार नहीं, पुरुषार्थ की प्रेरणा है। धर्म को कभी सैंपल के रूप में नहीं लेना चाहिए कि कुछ दिन पूजा करके देख लेते हैं कि क्या लाभ होता है। धर्म कोई प्रयोग नहीं, जीवन की दिशा है।
धर्म संकट-मोचन नहीं, जीवन का स्वभाव बने –
मुनिश्री ने कहा कि धर्म केवल दुख या विपत्ति दूर करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। सच्चा भाव होना चाहिए कि “मुझे कुछ नहीं चाहिए, मुझे धर्म चाहिए।” पूजा क्यों? क्योंकि मैं श्रावक हूँ। अतिथि सत्कार क्यों? क्योंकि यह मेरे धर्म का स्वभाव है। धार्मिक नियमों का पालन क्यों? क्योंकि यह मेरी धार्मिक पहचान है।
उन्होंने कहा कि मंदिर जाना धर्म की शुरुआत हो सकता है, लेकिन मंदिर से लौटकर अपने भीतर परिवर्तन लाना धर्म की सफलता है। मंदिर जाने के बाद स्वयं से पूछें कि मैं कितना बदला? यदि मंदिर जाने के बाद क्रोध, मोह, लोभ कम हुआ और दृष्टि निर्मल हुई, तभी धर्म जीवन में उतर रहा है। धर्म वह नहीं जो केवल दिनचर्या बदल दे, धर्म वह है जो दृष्टि बदल दे। धर्मसभा में चक्रवर्ती सपना मनीष गोधा नवीन आनंद गोधा अशोक डोशी, हर्ष जैन, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, राजेश जैन दद्दू राहुल सेठी, भूपेंद्र जैन कमल जैन चेलेंजर सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।