बाहरी त्याग नहीं, मन की आसक्ति छोड़ना ही सच्चा त्याग – मुनिश्री सुधासागर जी

इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । दलालबाग में आयोजित धर्मसभा में विद्या सुधा देशना मंडप में तीर्थ चक्रवृती मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य जीवनभर संसार और धर्म के बीच भटकता रहता है, लेकिन यह तय नहीं कर पाता कि उसे जाना कहाँ है। मोक्ष की ओर जाना है तो उसका मार्ग चुनिए, लेकिन जीवन को बिना दिशा के मत चलाइए। दिन गुजरता है, रात गुजरती है और इसी में जीवन की शाम हो जाती है।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि अपनी मंगल देशना में संबोधित करते हुए कहा कि किसी वस्तु को छोड़ देना मात्र त्याग नहीं है। यदि वस्तु छोड़ने के बाद भी मन उसी ओर आकर्षित होता रहे तो आत्मपरीक्षण जरूरी है। नमक छोड़कर दूसरे स्वादों का अधिक सेवन करना स्वाद की लालसा छोड़ना नहीं है। सच्चा त्याग तब है जब वस्तु के साथ-साथ उसके प्रति आसक्ति भी समाप्त हो जाए।
महाराजश्री ने कहा कि मुंह में नमक की डली दबी हो तो शक्कर का स्वाद नहीं आएगा, वैसे ही भीतर मोह, ममता, अहंकार और विषयों की आसक्ति रखकर मंदिर जाने, पूजा करने से धर्म का आनंद नहीं मिलता। दोष धर्म में नहीं, भीतर छिपी आसक्ति में है। यदि त्याग से एक दिन पहले उसी वस्तु का दोगुना भोग करने की योजना बने तो यह त्याग नहीं, भोग की तैयारी है। धर्म वह है जो दृष्टि बदले, त्याग वह है जो आसक्ति घटाए और दान वह है जिसमें प्रतिफल की अपेक्षा न हो। धर्मसभा में सपना मनीष गोधा नवीन आनंद गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, संजय पाटोदी, , राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली, कमल जैन चेलेंजर डॉ जैनेन्द्र जैन सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

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