निमियाघाट/कोडरमा। अहिंसा संस्कार पदयात्रा के प्रणेता साधना महोदधि भारत गौरव उभय मासोपासी आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज निमियाघाट के सहस्त्र वर्ष पुरानी भगवान पारसनाथ की वरदानी छांव तले विश्व हितांकर विघ्न हरण चिंतामणि पारसनाथ जिनेंद्र महाअर्चना महोत्सव पर भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए।
अंतर्मना प्रसन्नसागरजी ने कहा:- हार का जीवन से गहरा संबंध है अच्छे व्यवहारवाद के विचार के लिए अच्छा आहार अत्यंत जरूरी है शाकाहार सर्वश्रेष्ठ आहार है शाकाहार सात्विक है सुपाच्य स्वास्थ्यवर्धक है जबकि मांसाहार तामसिक है वह मनुष्य को क्रूर बनाता है कहते हैं मनुष्य का विकास बंदर से हुआ है डार्विन की थ्योरी ने अपने विकास वाद के सिद्धांत मैं बंदर को केंद्र माना है यानी बंदर ही विकास करते-करते मनुष्य में परिवर्तित हो गया मैं कहता हूं मनुष्य बंदर का विकास नहीं अपितु बंदर का हीरोस है अता प्रकृति से मनुष्य शाकाहारी है बंदर आज भी शाकाहारी है ।
आचार्य प्रसन्नसागर ने कहा विश्व में ऐसा कोई भी धर्म या मजहब नहीं है जो हिंसा क्रूरता तथा संघार के पक्ष में हो दुनिया के सभी धर्म अहिंसा दया कर्म उपकार और सह अस्तित्व को पक्ष में है विश्व के सभी धर्म शास्त्रों में महापुरुषों ने हर प्राणी मात्र को परमात्मा का अंश देखा है तथा हरजीत को परमात्मा की संतान कहकर पुकारा है ऐसी स्थिति में किसी जीव की हत्या करना अपने स्वार्थ के लिए मारना परमात्मा का अपमान ही तो है एक महापाप भी है दुनिया का कोई भी धर्म या धर्म शास्त्र हत्या हिंसा को धर्म नहीं मानता किसी ग्रंथ में यह नहीं लिखा कि जीव हिंसा धर्म है किसी धर्म शास्त्र में नहीं लिखा कि व्यभिचार धर्म है और यदि किसी धर्म शास्त्र में यह नहीं लिखा है कि हिंसा और व्यभिचार धर्म है यदि किसी धर्म शास्त्र में हिंसा जीव हत्या है तो समझना वह धर्मशास्त्र नहीं है जिस धर्म शास्त्र में जीव हत्या व्यभिचार को धर्म कहा हो उन धर्म शास्त्रों को होली के हवाले कर देना चाहिए । उक्त जानकारी कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा, नवीन जैन ने दी।