श्रंमण संस्कृति के महामहिम पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के कर-कमलों से संपन्न हुई ऐतिहासिक दीक्षा



नई दिल्ली (राजेश जैन दद्दू) । श्रमण संस्कृति के महामहिम, पट्टाचार्य परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महामुनिराज संसघ के पावन सान्निध्य में आज दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले की पवित्र धरा पर 6 ब्रह्मचारी भाइयों की जैनेश्वरी दीक्षा अत्यंत हर्षोल्लास और वैराग्यमय वातावरण में संपन्न हुई। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि “संस्कार के बंधनों से मुक्त होकर, आत्मा की ओर अग्रसर…” — इसी भाव के साथ 6 ब्रह्मचारी साधकों ने संसार के समस्त परिग्रह का त्याग कर दिया। आचार्य श्री ने दीक्षा 5 व्रहमचारीयो को मुनि दीक्षा प्रदान कर 1 व्रहमचारी को आचार्य श्री ने छुल्लक दीक्षा प्रदान कर सभी दीक्षार्थियों को नया नाम, नया जीवन और नया लक्ष्य प्रदान किया।
दीक्षा उपरांत नवदीक्षित संतों के नाम इस प्रकार हैं —
पुराना नाम (गृहस्थ अवस्था) नया नाम (मुनि अवस्था)
- अंकित भैया – मुनि श्री अभिनव सागर जी
- अनिकेत भैया – मुनि श्री आर्णव सागर जी
- यश भैया – श्री आलोक सागर जी (मुनि)
- प्रसन्न भैया – मुनि श्री अयुत सागर जी
- वकील साहब – मुनि श्री अर्जेय सागर जी
- अशोक जी क्षुल्लक- श्री अतिशय सागर जी
दीक्षा का दृश्य — त्याग ही सच्चा सुख है —
दीक्षा स्थल पर आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी मुनिराज संसघ स्वयं विराजमान थे। उनके समक्ष इन 6 साधकों ने केशलोंच कर, पिछी-कमंडलु धारण किया। आचार्य श्री ने अपने मंगल आशीर्वचन में कहा — *”त्याग, तप और संयम से ही जीवन में सच्चा सुख है। इसी मार्ग पर बढ़ते हुए इन साधकों को मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो। और सिद्ध शिला पर विराजमान हो का आशीर्वाद दिया।
उल्लेखनीय है कि इनमें से एक वकील साहब भी हैं, जिन्होंने न्याय के क्षेत्र से निकलकर आत्म-कल्याण के मार्ग को चुना है, जो युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है।
यह दीक्षा केवल 6 व्यक्तियों की दीक्षा नहीं, बल्कि भारत की युवा पीढ़ी को यह संदेश है कि सच्चा सुख भौतिकता में नहीं, आध्यात्मिकता में है। लाल किले जैसा राष्ट्रीय स्थल इस वैराग्य का साक्षी बना, यह जैन धर्म के लिए अत्यंत गौरव का विषय है।
सम्पूर्ण भारतवर्ष के सकल जैन समाज ने नवदीक्षित मुनिराजों के चरणों में त्रिवार नमोस्तु करते हुए उनके संयममय जीवन के लिए मंगलकामना की है। नमोस्तु शासन जयवंत हो।