परमात्मा खोजने से नहीं खोदने से मिलता है – जैन आचार्य प्रसन्नसागर जी महाराज

निमियाघाट/कोडरमा। अहिंसा संस्कार पदयात्रा के प्रणेता साधना महोदधि भारत गौरव उभय मासोपासी आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज निमियाघाट के सहस्त्र वर्ष पुरानी भगवान पारसनाथ की वरदानी छांव तले विश्व हितांकर विघ्न हरण चिंतामणि पारसनाथ जिनेंद्र महाअर्चना महोत्सव पर भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए।
अंतर्मना प्रसन्नसागरजी ने कहा जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ।
मै बोरी खोजन गई रही किनारे बैठ।।
जिसने खोजा है उसी ने पाया है जिंदगी के असली मोती गहराई में मिलते हैं जो इस डर से कि डूब जाऊंगा किनारे पर ही बैठा रहा वह कुछ ना पा सका तैरना है तो तालाब में उतरना ही पड़ता है बिस्तर पर लेट कर देना थोड़ी ना सीखा जा सकता है नदी में डूबने का खतरा भले ही हो वही जिंदगी है इसलिए डुबकी लगाने से घबराए नहीं जीवन वह सागर है जो डूबने से कतराता है और सौ फ़ीसदी डूबता है जो डर जाता है वह बेमौत ही मर जाता है हम जीवन में गहरे उतरे और देखें की जीवन का सत्य क्या है जीवन गहरे में है और ‘भीतर’ में है जो ‘भीतर’ जाता है केवल वही ‘तर’ पाता है
हम भीतर गए
हम भी — तर गए।
तुम भीतर जाओ,
तुम भी —तर जाओ।
आचार्य प्रसन्नसागर ने कहा- महावीर वाणी है जो भीतर जाता है वह भी तर जाता है तुमने कभी ख्याल किया जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां हमेशा ध्यान रखना मिलती हैं क्यों तीर्थंकर भी खुद के भीतर चले गए खुद के ध्यान में खो गए ध्यान मग्न हो गए और फिर वह पा गए जो असली था सत्य था ध्यान का मार्ग आंख बंद कर लेने का मार्ग है खुली आंख से दुनिया का सबसे दिखता है जीवन का सत्य देखना है तो बाहर की आंखों का बंद होना जरूरी है ध्यान मग्न होना जरूरी है यही संदेश जैन प्रतिमाओं से मिलता है तीर्थंकरों की प्रतिमाओं से मिलता है एक बात और जीवन की ऊंचाइयों को पाना है तो उनसे ऊंचे पर्वतों पर्वत को शिखरों और पहाड़ों की चोटियों पर तप राधना करनी होगी यही संदेश उनसे पर्वतों पर बने जैन तीर्थ देते हैं हिंदुस्तान में जितने भी जैन तीर्थ हैं तीर्थंकरों के निर्माण भूमिया है वे सभी पहाड़ों पर है। कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार जैन अजमेरा, नवीन जैन ने उक्त जानकारी दी ।

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