रतलाम । अनादिकाल से नदी का प्रवाह बहता जा रहा है, इसमें असंख्य जल के कण आते है और बह जाते है, लेकिन उसमें से वो कण धन्य है जो किसी प्यासे की प्यास बुझाते है और अपना जन्म सफल करते है । ऐसे ही लाखो करोड़ो अरबों खरबों जीव आत्माओं का भ्रमण इस संसार में चल रहा है, जो लगातार एक गति से दूसरी गति में जन्म लेती है और मृत्यु को प्राप्त होती है, लेकिन इनमें से कुछ ही आत्माएं अमर होती है ।
ऐसी ही एक आत्मा ने इस रतनपुरी रतलाम में सम्वत 1904 में जन्म लिया (175 वर्ष पूर्व) ।
आज उनका 138वाँ पूण्य स्मरण दिवस है। उस दिव्य बालक का नाम त्रिलोकचंद था, धन वैभव और ऐश्वर्य पूर्ण घर में उन्होनें जन्म लिया था। उनके जन्म के 4 माह पूर्व ही उनके धर्मनिष्ठ पिताजी का देहावसान हो गया था।
माता नानुबाई ने उनका पालन पोषण किया। बालक त्रिलोक 4 भाई बहन में सबसे छोटी सन्तान थी, माता बहुत ही धर्मनिष्ठ थी और साधु संतों की सेवा में हमेशा ततपर रहती थी एंव सन्त सतियों के संयम पालन का पूरा ख्याल रखती थी संयम पालन में कोई त्रुटि होती तो उन्हें बताने और समझाने में कोई कसर नही रखती थी, सन्त सती रतलाम में आते तो नानू बाई को जरूर याद करते।
एक बार जब नानुबाई सन्तो की सेवा में बैठी थी तो सन्त ने अनायास की कहा की नानुबाई कँहा इस संसार के फेर में पड़ी हो संयम का मार्ग अंगीकार करो उस वक्त बालक त्रिलोक और बेटी मीराबाई भी उनके साथ थे वो बोली की बच्चे छोटे है इनकी जवाबदेही मुझ पर है।
बच्चों ने जब यह सुना तो उन्होंने सोचा की हम माँ के संयम में बाधक बन रहे है तो उन्होने माँ से बात करी और त्रिलोक और मीराबाई भी माँ के साथ संयम लेने के लिए तैयार हो गए, जब घर में यह बात हुई तो बड़े भाई कँवरचंद ने भी दीक्षा लेने का संकल्प किया।
इस प्रकार एक ही घर में से एक साथ 4 दिखा माँ और 3 सन्तान की दीक्षा होना तय हुआ ।
उस वक्त बालक त्रिलोक की उम्र मात्र 9 वर्ष थी। संवत 2014 में रतलाम नगर में इस दीक्षा प्रसंग में कई सन्त सतियों का आगमन हुआ। और 4 भव्य दीक्षा सम्पन्न हुई। नानुबाई महासती, मीरा कुँवर महासती, कँवर ऋषि और त्रिलोक ऋषि जी नाम रखे गए।
उस वक्त 9 वर्ष की उम्र में बच्चे बाल सँवारना नही जानते थे उस उम्र में त्रिलोकऋषि जी ने लोच कर लिया।
त्रिलोक ऋषि जी महाराज सा के गुरु एवन्ताऋषि जी थे। जिंदगी में तीन गुण अगर हो जो जीवन सफल हो जाता है विनय सरलता और समता। त्रिलोक ऋषि जी में ये सब गुण थे । दीक्षा के मात्र 1 वर्ष के भीतर उन्होंने चार आगम कंठस्थ कर लिए थे। तीक्ष्ण बुद्धि विनय और विवेक के सहारे वे 15 वर्ष की उम्र में आध्यात्मिक कविता बनाने लगे थे।
लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था, मात्र सोलह वर्ष की उम्र में उनके सिर से गुरु का साया भी छीन गया उनके जीवन में अंधकार छा गया और वो हताश व निराश हो गए।
ऐसे वक्त में उस वक्त के श्रावकों ने उनको खूब हौंसला दिया श्रावक उनके मुँह से आगम सुनते और खूब पसंद करते और उन्हें आगे अध्धयन के लिए प्रेरित किया।
त्रिलोक ऋषि जी महाराज सा ने अपने जीवनकाल में 75000 काव्य का सृजन किया । कई लावणी बनाई, भगवान महावीर, गौतम स्वामी, पंचम आरे के बारे में उन्होंने कई काव्य लिखे लावणी बनाई चोवीसीय बनाई।
स्थानकवासी समाज से सभी सम्प्रदायों में आज भी प्रतिक्रमण के बीच में उनके द्वारा रचित सेवईयां बोली जाती है ।
एक एक तीर्थंकर के ऊपर उन्होंने 125-125 बोल बनाए । 13 वर्ष के अध्ययन काल में उन्होंने 17 आगम कंठस्थ कर लिये।
एक अच्छे कवि के अलावा वे एक बहुत ही कुशल चित्रकार भी थे, उनके बनाए गए आध्यात्मिक चित्रों का बहुत ही गूढ़ अर्थ है । ज्ञानकुंजक, चित्रालंकार ऐसे कई आध्यात्मिक चित्र अपने आप में पूरी कहानी कहते थे, उनके बनाए चित्रों को सीधा सीधा लाइन से देखो तो स्तुति पढ़ने में आती थी, आड़ा, तिरछा, गोलाकार, चौकोर देखने में अलग बाते जैसे तीर्थंकर का वर्णन, सिध्दचक्र, उनका नाम बनाने का स्थान संवत सब का समावेश एक एक चित्र में हो जाता था।
वो अपने दोनों हाथों से और दोनों पैरों से लिख सकते थे और पैरों से भी चित्र बना लेते थे।
उत्तराध्यय सूत्र जो की काफी बड़ा सूत्र है उस सूत्र को प्रतिदिन खड़े होकर पूरा पूरा बोलते थे।
एक बार एक राजा ने जैनियों के धर्म को झूठा धर्म कह दिया उसने कहा की पानी की बूंद में असंख्य जीव होते है ऐसी कपोल बाते करने वाला धर्म झूठा धर्म है ।
संयोग से एक बार उस राजा का त्रिलोक ऋषिजी से मिलना हुआ तो एक श्रावक ने मुनि जी को उसी वक्त बताया की ये राजा हमारे धर्म के बारे में ऐसी बात इस कारण बोलता है।
त्रिलोक ऋषिजी उस राजा को कुछ नही कहा और उससे आराम से बात करते रहे और साथ साथ में कागज पर एक चित्र बनाते रहे और राजा के हाथ में वो कागज दिया और पूछा की क्या दिख रहा है। उस कागज पर मात्र 25 पैसे के सिक्के जितनी छोटी जगह में कुछ बना हुआ था, राजा ने कहा कुछ समझ नही आ रहा है, तो गुरू देव ने कहा ध्यान से देखो ये हाथी बनाया है जब राजा ने ध्यान से देखा तो बोला अरे हाँ यह तो हाथी है अब मुनि ने पुछा अब ये बताओ की इस चित्र में कितने हाथी है राजा ने कहा मुझे तो एक ही दिख रहा है, मुनिश्री ने हाइग्लास मंगवाकर राजा को हाथी गिनाए तो पूरे 65 हाथी उस छोटे से चित्र में बने थे ।
राजा आश्चर्य चकित रह गया तो फिर त्रिलोकऋषि जी ने कहा जब इस चवन्नी जैसी जगह पर 65 हाथी हो सकते है तो पानी की एक बूंद में असँख्य जीव क्यों नही हो सकते है, प्रमाण के साथ कही बात को राजा ने शिरोधार्य किया और संकल्प लिया की जैन धर्म को झूठा नही कहेगा ।
ऐसे थे कवि, लेखक, चित्रकार, साहित्यकार त्रिलोकऋषि जी महाराज साहब मात्र 36 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हो गया। आज उनका 138वाँ पूण्य स्मरण दिवस है।
आज पूरे देश में लगभग सभी जैन संघो के पुस्तकालय में उनकी लिखित रचनाए मिल जाती है। कई सन्त सतियों ने उनके साहित्य पर शोध करके पीएचडी की डिग्रीयां प्राप्त की है।
रतनपुरी रतलाम के लिए यह गर्व की बात है की ऐसे महान संत ने इस रतलाम की धरा पर जन्म लिया।
कोई भी धार्मिक पाठ यदि याद नही हो रहा हो, या धार्मिक पाठ याद करना हो तो सर्वप्रथम श्रद्धा के साथ त्रिलोक गुरुवे नमः का जप करके पाठ की शुरुवात करो पाठ जल्द से जल्द कंठस्थ होगा।
गुरुदेव त्रिलोक ऋषिजी महाराज के पुण्य स्मरण दिवस पर शत शत नमन। उनका आशीर्वाद और कृपादृष्टि सदैव रतनपुरी पर बनी रहे।