
बीसपंथी कोठी, सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखर जी। सिंह निष्क्रीडित व्रत(उत्तम) की साधना में लगातार 189 वा उपवास में तप, ध्यान, सामयिक करते है। गुरुदेव अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज अकंप साधना करते हुए गुरुदेव , जो अनुपम , अनमोल , अद्भुत , अविस्मरणीय , अकल्पनीय दृश्य है।
अन्तर्मना की वाणी और मुनि श्री 108 पीयूष सागर जी महाराज की जुबानी में बताया कि गांधी स्वप्न जब सत्य बना,
देश तभी जब गणतंत्र बना..
आज फिर से याद करें वह मेहनत,
जो की थी वीरों ने और गणतन्त्र ये भारत बना..
भारत एक धर्म प्राण मुल्क है। सभी धर्मों का समादर करना, भारतीय संस्कृति की विशेषता है। अनेकता में एकता, एकता में अनेकता, भारत की सांस्कृतिक परंपरा है। धर्म और अध्यात्म भारत की धड़कन है। *यह तीर्थंकरों और अवतारों का देश है। यह ऋषि और मुनियों का देश है। चाँद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं। अभिनंदन की भूमि है। इसका कंकर शंकर है। इसका बिंदु गंगाजल है। यहाँ ऋषि मुनियों की खदानें हैं। यहाँ ॠषभनाथ और नेमिनाथ हुए हैं। राम और कृष्ण हुए हैं। बुद्ध और महावीर हुए हैं। व्यास और बाल्मीकि हुए हैं। कुंदकुंद और जिनसेन हुए हैं। सूर और कबीर हुए हैं। तुलसी और कालिदास हुए हैं। चंद्रगुप्त और चाणक्य हुए हैं। भरत और जनक हुए हैं। अरविंद और गांधी हुए हैं।
दुनिया में भारत ही, एक ऐसा देश है जहाँ दार्शनिक कम, सत्य दृष्टा ज्यादा पैदा हुए हैं।जहाँ वैज्ञानिक कम और तत्वदर्शी ज्यादा पैदा हुए हैं। यह वह देश है, जहाँ राजा शिवि ने, एक पक्षी को बचाने के लिए अपने प्राणों को अर्पण कर दिया था। *पर बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ता है – महावीर और गांधी का देश, आज हत्यारों का देश बन गया है। हमारे देश का कायदा और कानून यही बताता है कि जनता की डोर नेताओं के हाथ में होनी चाहिए। और नेताओं की डोर संतो के हाथ में होनी चाहिए। तभी देश खुशहाल और समृद्ध बन सकेगा। लेकिन आज दुर्भाग्य से सब कुछ उल्टा हो रहा है। कल तक लोगों में दुष्कर्म के प्रति झिझक थी, एक संकोच था, एक शर्मिंदगी थी, लेकिन आज जो कुछ हो रहा है, वह अभूतपूर्व हो रहा है। आज आदमी के मन में जो बुरे काम के प्रति, एक संकोच और भय था, वह टूट गया है। कल तक लोग दिन के उजाले में बदनाम गलियों में, जाने से बचते थे। पर अब ऐसा कुछ भी नहीं बचा। आज बदनामी का कोई लेवल आदमी को बदनाम नहीं कर पा रहा है।
ध्यान रहे
आदमी अपने सत्कर्मों से ही चिर स्मरणीय बनता है। *दीर्घ जीवन स्मरणीय नहीं होता। अपितु स्मरणीय जीवन ही दीर्घ होता है। इसलिए जियो और जीने दो। जियो और जीने दो के अनुरूप जीव दया के मसीहा अंतर्मना जी।
उक्त जानकारी कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार जैन अजमेरा, नवीन जैन,कोलकोता से विवेक जैन गंगवाल ने दी।