तप का सार शरीर को गलाना नहीं अपितु आत्मा मे लगे कषायों को धोना है -मुनिराज श्री रजतचन्द्र विजयजी म.सा.

तपस्या के जयकारों के साथ में गुरु भगवंत एवं तपस्वी का आगमन हुआ

महाड । अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर प.पूज्य परोपकार सम्राट गच्छाधिपति आचार्यदेव श्रीमद्विजय ऋषभचंद्र सूरीश्वरजी महाराजा साहेब के शिष्य परम पूज्य मुनिराज श्री रजतचन्द्र विजयजी मसा मुनिश्री जनकचंद्र विजयजी मसा की पावन निश्रा में प्रात: शुभ वेला में 09:30 बजे वर्षितप की तपस्वी बहन ललिताबेन विनोदजी ओसवाल के निज निवास से चल समारोह (वरघोड़ा) महावीर भवन पहुंचा एवं धर्मसभा में परिवर्तित हुआ । तपस्या के जयकारों के साथ में गुरु भगवंत एवं तपस्वी का आगमन हुआ। सर्वप्रथम श्री संघ द्वारा गुरु वंदना व गुहूंली कि गई, उसके पश्चात पूज्य मुनि श्री ने मंगलाचरण फऱमाया । कुछ बहनों ने तपस्या के गीत व भक्ति गीत से माहौल को भक्तिमय बनाया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य प्रवचनदक्ष मुनिराज श्री रजतचन्द्र विजयजी म.सा. ने उमा स्वातीजी महाराजा रचित तत्वार्थ सूत्र ग्रंथ का उल्लेख करते हुए बताया इच्छा निरोध तप जहां इच्छाओं को रोक दिया जाए वह तप है। तप का सार शरीर को गलाना नहीं अपितु आत्मा मे लगे कषायों को धोना है। आगे मुनिश्री ने कहा तप से कर्मों की निर्जरा होती है। तप से आत्मा उज्जवल बनती है । देवलोक के इंद्र महाराजा भी तपस्वी को वंदन करते हैं एवं तप प्राप्त करने के लिए तड़पते रहते हैं इसीलिए जीवन में तप कर आत्म कल्याण करना चाहिए। इस मौके पर मुनि श्री जनकचंद्र विजयजी म.सा.ने कहा अक्षय तृतीया यानि जिसका कभी क्षय नहीं हुआ जो अखंड है। इसी दिन भगवान आदिनाथ के पौत्र श्रेयांस कुमार ने प्रभु को इक्षु रस से पारणा करवाया था । तप के द्वारा निकाचित कर्म क्षय होते है । तप द्वारा निर्मल काया और आत्मा को मुक्ति की गति होती है। तत् पश्चात् तपस्वी बहन को अक्षत से वधामणा किया गया। प्रथम वधामणा आठ उपवास की तपस्या द्वारा बोली का चढ़ावा आंध्र प्रदेश के तुणी से पधारी तपस्वी की खास सखी हेमाबेन प्रविणजी सियाणा ने लिया। दूसरे वधामणे का चढ़ावा बेंगलुरु से पधारे ओसवाल परिवार की बहनों ने 24 उपवास में मुनिश्री की प्रेरणा से लिया। मुनिश्री ने कहा एक वर्ष में बोली के उपवास करने होंगे।
1 दिन पूर्व 3 मई को गुरु भगवंतों का वाजते गाजते धूम-धम के साथ मंगल प्रवेश हुआ। मंगल प्रवेश के बाद जिनवाणी का श्रवण करवाया गया। महाड श्रीसंघ को रात्रि प्रवचन का लाभ भी मिला ।
6 मई को महाड़ श्रीसंघ में सर्वप्रथम बार दादा गुरुदेव श्रीमद्विजय राजेंद्र सूरीश्वरजी महाराजा साहेब के भक्ति संगीतमय गुरुपद महापूजन का भव्य दिव्य आयोजन किया जा रहा है। महापूजन का लाभ श्रीसंघ द्वारा एवं उसके पश्चात स्वामीवात्सल्य का लाभ छौगमलजी प्रवीणकुमारजी परिवार द्वारा लिया गया है।

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