महलवाडा में चल रही प्रवचनमाला में हजारों लोगों ने लिया लाभ, जीने के गुर सीखकर श्रद्धालु हुए आनंद विभोर

रतलाम। राष्ट्र-संत ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि जीवन में स्मार्टनेस का मूल्य है, पर हर सफलता के पीछे स्मार्टनेस का मूल्य 30 प्रतिशत होता है, जबकि नज़रिये का मूल्य 70 प्रतिशत। सोचिए, हमें अपने जीवन में 30 प्रतिशत को मूल्य देना चाहिए या 70 प्रतिशत को। याद रखें, सकारात्मक नज़रिये के लोग विजयी टीम का हिस्सा होते हैं, जबकि घटिया नज़रिये के लोग टीम के हिस्से कर डालते हैं। अच्छे नज़रिये के लोग उसूलों पर अडिग रहते हैं, बाकी छोटी-मोटी बातों पर समझौता कर लेते हैं, जबकि नकारात्मक नज़रिये के लोग बातों पर अडिग रहते हैं, पर उसूलों पर समझौता कर बैठते हैं। उन्होंने कहा कि सकारात्मक नज़रिये के लाभ हैं – 1. कार्य-क्षमता में वृद्धि, 2. मिल-जुलकर काम करने की उत्सुकता, 3. रिश्तों में बेहतरता, 4. तनाव से बचाव और 5. प्रभावी व्यक्तित्व तथा भाषा का विकास। वहीं नकारात्मक नज़रिये के नुकसान हैं – 1. कड़वाहट, 2. नाराज़गी, 3. लक्ष्यहीन ज़िंदगी, 4. सेहत खराब और 5. अपने तथा दूसरों के लिए तनाव।
संतप्रवर गुरुवार को श्री जैन श्वेतांबर खरतरगच्छ जैन संघ द्वारा नगर निगम के पास महलवाडा में आयोजित जीने की कला प्रवचन माला के दूसरे दिन श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हम नज़रिये को बेहतर बना सकते हैं। सकारात्मक नज़रिये का व्यक्ति हमेशा समाधान का हिस्सा होता है, वहीं नकारात्मक नज़रिये का व्यक्ति समस्या का हिस्सा होता है। उन्होंने कहा कि अपने नज़रिये को सकारात्मक और उत्साहपूर्ण बनाएँ। नकारात्मक और उदासीन नज़रिया घाटे का सौदा है। हम अपनी सोच बदलें और हमेशा अच्छाई देखें। जो गलतियाँ ढूँढऩे के आदी हैं, वे स्वर्ग में भी चले जाएँ तो भी गलतियाँ ढूँढऩे से नहीं चूकते। कबाड़ी तो विवाह-मंडप में खड़ा होगा, तब भी अटाला ही ढूँढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि हमेशा आधा गिलास भरा हुआ देखें। किसी के द्वारा किए गए अपमान को याद रखने की बज़ाय यह देखें कि वह अब तक हमारे कितना काम आया है। अहसानों और उपकारों को याद कर कृतज्ञ बनें, कृतघ्न नहीं। हम नकारात्मक सोच से बचें। हर हाल में नकारात्मक सोच से बचें। सकारात्मक सोच अपनाएँ, हर हाल में सकारात्मक सोच अपनाएँ। एक अकेली सकारात्मक सोच से आपके जीवन में विकास और मिठास के ढेर सारे द्वार खुलते जाएँगे। उन्होंने कहा कि दूसरों से ऐसा व्यवहार कीजिए, जो हम दूसरों से पाना चाहते हैं। आखिर तलवार की कीमत धार से होती है और इंसान की कीमत व्यवहार से। जो काम आप आज कर सकते हैं, उसे कभी भी कल पर न टालें। जो यह कहते हैं कि मैं यह काम फिर किसी दिन कर लूँगा, तो इसका मतलब है कि यह काम उनके भरोसे तो नहीं होगा। याद रखें, जो हालात का सही ढंग से सामना कर सकते हैं, जो व्यवहार में बड़प्पन दिखाते हैं, अप्रिय व्यवहार पर बुरा नहीं मानते, जो खुशियों पर काबू रखते हैं, कठिनाइयों को अपने पर हावी नहीं होने देते, जो तुक्के से मिली सफलता की बजाय काबिलियत और बुद्धि से मिली कामयाबी पर खुश होते हैं और जो अच्छे-बुरे में चुनाव करना जानते हैं, वे ही सही अर्थ में शिक्षित और सफल हैं। बेहतर होगा कि हम अपने हर दिन की शुरुआत किसी अच्छे विचार को पढऩे या सुनने से करें। सुबह का यही विचार दिन में हमारे व्यवहार में भी प्रगट होगा।
इस दौरान डॉ मुनि शांतिप्रिय सागर ने कहा कि इंसान की आत्मा उसके दिल में नहीं, बल्कि इंसानियत में बसती है। जिसके दिल में इंसानियत की दौलत है, ईश्वर की नज़र में वह उसकी सच्ची संतान है। हिन्दू धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म, इस्लाम और ईसाई धर्म ये सब धर्म के विशेषण और व्यवस्थाएँ हैं, बाकी तो दुनिया के समस्त इंसानों का एक ही धर्म है और वह है इंसानियत। आग का धर्म जलना है, फूल का धर्म खिलना है, काँटे का धर्म गड़ना है, पानी का धर्म प्यास बुझाना है। जब दुनिया की हर चीज का एक ही धर्म है तो फिर सोचिए इंसान होकर इंसान का क्या धर्म बनता है? सारी दुनिया का एक स्वर में एक ही जवाब निकलेगा ¬- इंसान होकर इंसान के काम आना। प्रभु अक्सर अपने रूप में कम और किसी कुत्ते या भिखारी के रूप में ज़्यादा प्रकट हुआ करते थे। आप किसी भूखे को खाना खिलाकर देखिए, आपको वही सुकून मिलेगा, जो ठाकुरजी को भोग लगाने पर मिला करता है। हाथ से फेंका गया पत्थर 100 फीट दूर जाकर गिरता है, बंदूक से निकली गोली 1,000 फीट दूर तक पहुँचती है, तोप से दागा गया गोला 5,000 फीट दूरी तक पहुँचता है, पर एक गरीब को खिलाई गई रोटी सीधे स्वर्ग तक पहुँचा करती है।
उन्होंने कहा कि घर में खाना बनाते समय एक मुट्ठी आटा अतिरिक्त भिगोएँ और सुबह पूजा करते समय 10 रुपए ईश्वर के नाम पर गुल्लक में डालें। एक मुट्ठी आटे की रोटियाँ तो दुकान जाते समय गाय-कुत्तों को डाल दें और नगद राशि को इकट्ठा होने पर किसी बीमार या अपाहिज की मदद में लगा दें। मात्र नौ महिने में आपके सारे ग्रह-गोचर अनुकूल हो जाएँगे। रास्ते से गुजरते समय मंदिर आने पर आप प्रार्थना में हाथ जोड़ें या न जोड़ें, पर अगर कोई एंबुलेंस गुज़रती नज़र आए तो उसे देखकर उसके लिए ईश्वर से दुआ अवश्य करें। संभव है आपकी दुआ उसे नया जीवन दे दे।
उन्होंने कहा कि अगर आप किसी मज़दूर से दिनभर मेहनत करवाते हैं तो उसका पसीना सूखे उससे पहले उसे उसका मेहनताना दे दीजिए। किसी के मेहनताने को दबाना हमारे आते हुए भाग्य के कदमों पर दो कील ठोकना है। विद्यालय भी ईश्वर के ही मंदिर हुआ करते हैं, पर विद्यालय बनाना हर किसी के बूते की बात नहीं होती। आप केवल किसी यतीम बच्चे की पढ़ाई को गोद ले लीजिए, आपको विद्यालय बनाने जैसा पुण्य ही मिलेगा। बिल गेट्स और अजीम प्रेमजी जैसे अमीरों ने दुनिया की भलाई के लिए हजारों करोड रुपयों की चौरिटी की है। आप फू ल-पांखुरी ही सही, चौरिटी के काम अवश्य करें। दुनिया में कुछ लोग खाकर राजी होते हैं, कुछ लोग खिलाकर। आप प्रभु से प्रार्थना कीजिए कि प्रभु सदा इतना समर्थ बनाए रखना कि मैं औरों को खिलाकर खुश होने का सौभाग्य प्राप्त करूँ।
प्रवचन के बीच जब संत प्रवर ने हिम्मत न हारिए, प्रभु न बिसारिये, हंसते मुस्कुराते हुए जिंदगी गुजारिए…. भजन गुनगुनाया पर श्रद्धालु आनंद विभोर हो गए।
कार्यक्रम में संघ अध्यक्ष मनसुख चोपड़ा, विक्रम सिंह कोठारी, राजेंद्र कोठारी, कांतिलाल चोपड़ा, शैलेंद्र पावेचा, ऋषभ पावेचा ,जय चोपड़ा अनिल संचेती, पारस चोपड़ा, अशोक चोपड़ा, चितरंजन लालन, श्रेणिक सराफ, शरद चौरडिया, आलोक गांधी, भूपेंद्र कोठारी, हेमंत बोथरा ने दादा गुरुदेव के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का श्रीगणेश किया।
कार्यक्रम में मंच संचालन कांतिलाल चोपड़ा ने किया और आभार मनसुख चोपड़ा ने दिया।
शुक्रवार को होगा प्रवचनमाला का समापन, घर को कैसे स्वर्ग बनाएं विषय पर मिलेगा मार्गदर्शन – सचिव जितेंद्र चोपड़ा ने बताया कि शुक्रवार को महल वाडा में अंतिम प्रवचन होगा जिसमें संत प्रवर रात्रि 8:00 से 10:00 तक घर को कैसे स्वर्ग बनाए विषय पर आम जनता को संबोधित करेंगे।