जन-जन के जैन दिवाकर श्री चौथमलजी म.सा.

सुरेन्द्र मारू, इंदौर

जैन दिवाकर पूज्य गुरुदेव श्री चौथमलजी महाराज का जीवन एक उपवन / उद्यान /बागीचे के समकक्ष रहा है ,जहाँ हरे भरे वृक्ष पर कलरव करते पक्षी, दुर्लभ वनस्पति, सुंदर रंग बिरंगे फूल, मीठे फलों से लदालुम छायादार वृक्ष, कल कल करते झरने, नदियाँ मन को आल्हादित कर देने वाले उनके साहित्य, ग्रंथ, और गीतोँ को पढ़कर, भजनों में डुबकर नित नई प्रेरणा मिलती है। जैन दिवाकर श्री चौथमलजी महाराज भगवान महावीर के शासन के एक प्रभावक श्रमण थे। सन् 1950 के उनके जीवन के अंतिम वर्षावास कोटा में हुआ, जहां उन्होंने क्रांतिकारी कदम उठाते हुए *दिगंबर, श्वेतांबर मंदिरमार्गी और स्थानकवासी तीनों संतों को एक मंच पर बैठाकर प्रत्येक रविवार प्रवचन करवाये।
ऐसे ही स्थानकवासी संप्रदायों के बिखरे हुए अलग अलग परंपराओं के श्रमणत्व को देखकर उनका मन खिन्न हो जाता था। एक करने का बीड़ा अपने हाथ में लिया। वि. सं. 2005 में स्थानकवासी परंपराओं के पाँच परंपराओं के श्रमणो को एकत्रित कर श्री वीर वर्धमान जैन श्रमण संघ का गठन हुआ तो दिवाकर जी ने अपनी संप्रदायों के कुछ संतों के साथ *उपाध्याय श्री प्यारचंदजी महाराज* को संत सम्मेलन में प्रतिनिधि के रूप मे यह संकेत देकर भेजा कि – संघ के कल्याण के लिए अपने संप्रदाय की सभी पदवियों का त्याग कर देना। संगठन के लिए यदि सभी मुनिवर एकमत हो जाएं ।
तो आचार्य अपने संतों में से किसी को मत बनाना। ऋषि संप्रदाय के आचार्य ऋषि जी महाराज को आचार्य स्वीकार कर लेना।
संघ के गठन के साथ श्री आनंद ऋषि जी को आचार्य पद पर सुशोभित किया गया, तो जैन दिवाकर जी को चरम सुख और आनंद कि अनुभूति निश्चित हुई होगी।
संगठन के लिए अपनी संप्रदाय के सभी पद त्याग कर भी जो आल्हादित हो रहा था, तो उनके ही शिष्यों ने उनसे पूछ ही लिया हमारी संप्रदाय की सभी पदवियों को समर्पित कर हमें क्या मिला ? तब जैन दिवाकर जी का जवाब था – कि आज का बीज़ कल का वट वृक्ष बनेगा, संघ व्यक्ति से बढ़ा होता है। संघ हित के लिए सर्वस्व समर्पित कर देना चाहिए। एकता के मधुर फल जब आएँगे तब देखना।
जैन दिवाकर जी और एकता और संगठन के पक्षधरों की भावना अभिवर्धित हुई। और वि. सं. 2009 में सादड़ी (मारवाड) में अधिकांश स्थानकवासी संप्रदायों को मिलाकर श्रमण संघ की स्थापना हुई*। जैन दिवाकर जी आचार्य, उपाचार्य, उपाध्याय जैसे पदों पर भले ही आसीन ना हुए हों , लेकिन उनका व्यक्तित्व अत्यंत ही प्रभावक एवं कृतित्व कालजयी है।
आदरणीय श्री विपिन जारौली जी के छंद के साथ अपनी कलम को यहीं विराम देता हूँ।
साधु मार्ग मान्यता के, श्रमणों में कितने ही,
फिरको को देख कर ,क्षोभ मन आया था।
संयम में रह रत, रहें सभी एक मत,
बनें ऐसा संगठन, भाव बन आया था।
दिगंबर – श्वेतांबर के ,आचार्यों के संग कोटा,
एक मंच बैठ ,जिनवाणी को सुनाया था।
उसी भाव अनुरूप ,आज का श्रमण संघ
हुआ था गठित, जो कि सब मन भाया था।
साभार – जन जन के दिवाकर

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