

रतलाम । शरीर में सुधार आता है अस्पताल की यात्रा से आत्मा में सुधार आता है जिनवाणी की यात्रा से । सुख के दो प्रकार है भौतिक सुख एंव आध्यात्मिक सुख, सांसारिक कार्य वाला सुख भौतिक सुख है। सुख की तीन जातियाँ है, सुख, महासुख एंव परमसुख ।
सुख आता है कुछ समय के लिए है और फिर वापस चला जाता है। महासुख आता है और दीर्घकाल तक टिकता है, लेकिन वो भी वापस चला जाता है। परमसुख या तो आता ही नही है, और आ जाए तो फिर जाता नही है, ये स्थाई होता है ।
हमें मेहमान कैसे चाहिए जो आए औऱ जल्द से जल्द चले जाए, ज्यादा दिनों तक रुकने वाले मेहमान हमें नही चाहिये, स्थाई मेहमान हमें नही चाहिये ।
पहले अतिथि देवो भव माना जाता था, अब अतिथि यमदेवों भव माना जाता है, पहले सोच रहती थी कि अतिथि आए तो हम खाए अब सोच रहती है अतिथि जाए तो हम खाए ।
मतलब सुख तो हमें तीसरे नम्बर वाला चाहिये और मेहमान पहले नम्बर वाला।
पहला जो सुख है वो मानव जाति को मिलता है। दूसरा महासुख देवलोक में देवताओं को मिलता है जो जघन्य 10000 वर्ष के लिये एंव उत्कृष्ट 33 सागरोपम तक टिकता है। एंव परमसुख मतलब मोक्ष । वैसे तो मोक्ष मिलता नही और मिल गया उसके बाद खत्म होता नही है।
जँहा सुख है वँहा दुख भी है, मानव जीवन में अनुकूल परिस्थिति बन जाए तो सुख की अनुभूति होती है और प्रतिकूल परिस्थिति में दुख की अनुभूति होती है। सुख और दुख का जोड़ा है। क्षणिक सुख के पीछे हम सुबह से शाम तक भागते है, जबकि मनुष्य भव में रहते हुए ही हम परमसुख को प्राप्त करने का प्रयास कर सकते है ।
शतावधनी पूज्याश्री गुरु कीर्ति ने मेरे महावीर को जानो विषय को आगे बढाते हुए फरमाया की नयसार अंधेरे से उजाले की और गया, और मरिची उजाले से अंधेरे की यात्रा कर रहा है।
यदि आपका जीवन प्रकाशमान है तो अंत भी प्रकाशमय होना चाहिए, शुरुआत में भले ही अंधेरा हो लेकिन प्रयास करो की अंत में प्रकाशमान हो जाओ। अंत भला तो सब भला । आगम में कई उदाहरण है चंडकौशिक नाग का अंत प्रकाशमान हो सकता है, अर्जुन माली ने अपने अंत को सुधारा ।आपने महावीर को छोड़ दिया लेकिन महावीर ने आपको नही छोड़ा है । गौशालक ने तेजोलेश्या छोड़ी तो भी महावीर ने गौशालक का साथ नही छोड़ा ।
मरिची ने कपिल राजकुमार को अंदर भेजा, अंदर जाकर कपिल ने देखा यँहा तो भगवान के 84 गणधर, हजारों शिष्य, इतनी भीड़ है पता नही मेरा नम्बर कब आएगा, वो वापस लौटकर मरिची के पास आता है और मरिची से पूछता है की क्या आपके पास धर्म नही है। अब मरिची केवल तीन शब्द बोलता है “इत्तम ती तहेत”, मतलब धर्म यहाँ भी है और वँहा पर भी है। क्योंकि मरिची के मन मे शिष्य बनाने का लोभ आ गया था। यह वचन सुनकर कपिल मरिची का शिष्य बन गया। इस प्रकार अब मरिची ने आदिनाथ को भी छोड़ दिया। जब जब श्रद्धा के प्रति आस्था छोड़ देंगे तब श्रद्धा उसका साथ छोड़ देता है। मरिची की इस गलती का ऐसा परिणाम हुआ की उसके अगले 14 भव बिगड़ गए जँहा उसे न तो बोध मिला, न धर्म व गुरु मिले । देव लोक, मानव भव, देव लोक और मानव भव इस तरह उसने लगातार भव किये मानव भव में क्षत्रिय नही ब्राहम्ण कुल मिला और हमेशा छोटे भाई के रूप में जन्म मिला।
इस तरह मरिची ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी, शुरुआत में उसे भगवान मिले लेकिन अंत में उसने भगवान का साथ छोड़ दिया । इस तरह मरिची का अध्याय समाप्त हुआ भगवान आदिनाथ भी मोक्ष पधार गए। शास्त्रों में इसके आगे चौथे भव से 16वें भव तक विस्तृत जानकारी नही दी गई है। उसके अगले भव में यह आत्मा कँहा जन्म लेगी यह आगे सुनने पर पता चलेगा। संघ अध्यक्ष सुरेश कटारिया एंव कोषाध्यक्ष अमृत कटारिया ने बताया की शुक्रवार को माँ पद्मावती देवी के सामूहिक एकासन का लाभ श्रीमती विमलादेवी शैतानमलजी, पारस पवन मेहता परिवार ने लिया। आज के जाप श्रेणिकलाल अभयकुमार गाँधी के निवास बागड़ो का वास एंव दिनाँक 06 अगस्त के जाप रखबचन्द सुशील कुमार बाफना के निवास धानमंडी पर होंगे।