तीन बातों की कभी उपेक्षा नही करना चाहिये रोग, अग्नि और घाव- तप चक्रेश्वरी आयम्बिल आराधिका अरुणप्रभा जी म.सा.

रतलाम । आँखों में यदि शर्म नही तो जीवन में कुछ नही, खून यदि गर्म न हो तो जीवन में कुछ नही, सम्पन्नता की दुहाई देने वालो यदि जीवन में जिनवाणी नही तो जीवन में कुछ नही।
धर्मघोष ऋषि अपने शिष्यों के साथ जंगल के विहार कर रहे थे, एक राजकुमार के आँखों से अश्रुधारा बह रही थी, पैर को पकड़कर बैठा है जिसमें खून बह रहा था, आसपास सैनिक खड़े थे, ऋषि ने पूछा क्या हुआ राजकुमार को किसी जंगली जानवर ने घायल कर दिया या और कोई अनहोनी दुर्घटना हो गई। सेवको ने कहा की इनके पैर में काँटा चुभ गया है जो निकाल दिया लेकिन कुछ हिस्सा अंदर है जो राजकुमार को पीड़ा दे रहा है।
ऋषि ने कहा में अभी अभी राजगृही नगरी के गुनशीलक उद्यान में प्रभु महावीर की देशना सुनकर आ रहा हू, तुम छोटे सा काँटा चुभने से घबरा रहे हो। प्रभु ने इस बारे में बहुत ही सुंदर एक मंत्र दिया है की शल्य तीन प्रकार के होते है । ये जो आँखों से दिखाई देने वाला काँटा है इसकी पीड़ा तो कुछ नही है ।तीन शल्य बहुत सूक्ष्म है जो दिनरात हमारी आत्मा में चुभते है और भयंकर पीड़ा देते है । राजकुमार अपनी पीड़ा को भूलकर प्रश्न करता है वो तीन शल्य कौन कौन से है। ऋषि ने बताया
माया शल्य, निदान शल्य और मिथथ्यात्व दर्शन शल्य। शल्य मतलब चुभना, चुभ तो बात भी सकती है तभी तो व्यक्ति कभी कभी कहता है में मर जाऊँ तो फंला व्यक्ति को मेरी अर्थी को कंधा मत देने देना उसने मुझे चुभती हुई बात कही थी। तीखी नोंक वाले कांटे को शल्य कहते है।
छोटी चिंगारी बड़ी बड़ी बस्तियों को जला देती है, छोटा सा कर्ज यदि समय पर न चुकाया जाए तो व्यक्ति को दिवालिया बना देता है, छोटा सा शत्रु राज्य को खत्म कर सकता है, छोटा सा घाव भी नासूर बन सकता है, छोटी सी गठान केंसर बन सकती है । समय रहते हर बात का उपचार जरूरी है। तीन बातों की कभी उपेक्षा नही करना चाहिये रोग, अग्नि और घाव।
माया शल्य : प्रकृति की लीला को भी माया कहते है, पैसों को भी माया कहते है, एक माँ अपनी संतान से स्नेह करती है उसे भी माया कहते है।
एक माया कपट होती है बाहर से कुछ और एंव अंदर से कुछ और इसी माया शल्य के बारे में अगले प्रवचन में बताया जाएगा।
शतावधानी पूज्या श्री गुरु कीर्ति ने मेरे महावीर को जानों विषय को आगे बढाते हुए अश्वग्रीव विशाखानन्दी के 19वे भव के बारे में बताया की। अश्वग्रीव तीन खण्ड का स्वामी, पहला रावण, अन्यायी, अत्याचारी, मार काट करने वाला प्रजा उससे डरती थी, लेकिन वो स्वंय भी मन ही मन डरता था की कोई उसे मार देगा।
जँहा राम लक्ष्मण है वँहा रावण है जँहा कृष्ण बलराम है वँहा कंस है। अश्वग्रीव की गर्दन घोड़े के समान थी, उसके पास एक चक्र था जिसका कोई तोड़ नही था, वो जिस किसी पर चक्र से प्रहार करता चक्र उसकी गर्दन एक झटके में काटकर ही लौटता था।
अश्वग्रीव हमेशा ज्योतिषयों को बुलाता और पूछता की क्या मुझे मारने वाला कोई है । सारे ज्योतिष कहते आपको मारने वाला कोई नही है। यह अश्वग्रीव विशाखानन्दी का जीव है।
उधर विश्वभूति का जीव का देवलोक से आयुष्य पूर्ण करके राजा प्रजापति और माता मृगावती के यँहा जन्म लेता है उसके पीठ पर तीन लकीर थी इसलिये उसका नाम त्रिपुष्टि रखा गया । त्रिपुष्टि ने यँहा भी छोटे भाई के रूप में जन्म लिया बड़ा भाई राजकुमार अचल था ।
जैसे जैसे बड़ा होता है वो अश्वग्रीव के अत्याचार के किस्से सुनता है। वो पिता से कहता है आप राजा हो लेकिन अत्याचारी के गुलाम हो ऐसा राज किस काम का। पिता कहता है जब अश्वग्रीव को देखोगे तब तुम्हारी अक्ल ठिकाने आ जाएगी।
त्रिपुष्टि ने अश्वग्रीव को देखा नही लेकिन वो संकल्प लेता है की में अश्वग्रीव को मारूंगा।
एक पँहुचे हुए ज्योतिष जो चेहरा देखकर भविष्य बता देते थे से अश्वग्रीव ने वही प्रश्न पूछा तो ज्योतिष ने कहा आपको मारने वाले का जन्म हो चुका है । अश्वग्रीव ने नाम पूछा तो ज्योतिष ने कहा नाम तो नही बताऊंगा लेकिन जो आपके राजदूत को मारेगा वो ही आपको मारेगा। राजदूत को कोई मार नही सकता, ये राज का नियम भी होता है, लेकिन ज्योतिष कहता है जो नही हुआ वो ही अब होगा। अश्वग्रीव ने अपने राजदूत चन्द्रमेघ को बुलाया की तू तीनों खण्ड में जा सभी नियम तोड़ खूब अत्याचार कर अगर कोई
तुझे मारे तो मुझे खबर कर देना में तुझे बचाने आ जाऊँगा ।
चन्द्रमेघ सभी राज्यों में जाता है, सब जगह अत्याचार करता है अपशब्द बोलता है लेकिन कोई उससे कुछ भी नही कहता है। अंत में प्रजापति की सभा में गया वँहा गायन एंव नृत्य चल रहा था त्रिपुष्टि संगीत का बहुत शौकीन है। चन्द्रमेघ सभा में बहुत उत्पात मचाता है अपशब्द बोलता है लेकिन प्रजापति कुछ नही बोलता है, बल्कि उसका स्वागत सत्कार करता है।
त्रिपुष्ट को यह सहन नही होता है वो अपने भाई अचल को लेकर सभा से बाहर निकल जाता है, और जाते जाते अपने विश्वस्त मंत्री को बोल जाता है जब यह सभा से बाहर निकले तो मुझे खबर कर देना।
राजदूत बाहर निकला मंत्री ने खबर दी, त्रिपुष्ट ने अचल से कहा आप सैनिकों को सम्भालो में इसे देखता हूँ और त्रिपुष्ट ने राजदूत को बहुत मारा बहुत मारा और कहा की अत्याचार करता है कह देना अश्वग्रीव को की तुझे मारने वाला इस धरती पर आ गया है अब उसके जीवन के ज्यादा दिन नही बचे है।
इसके बाद प्रजापति राजदूत को फिर सभा में बुलाता है उसका स्वागत सत्कार आवभगत करता है और कहता है अश्वग्रीव से मेरे बेटे के बारे में कुछ मत कहना । डर के मारे राजदूत कहता है नही कहूँगा मुझे छोड़ दो ।
इस बात से त्रिपुष्टि को बहुत क्रोध आता है की पिता बार-बार इस अत्याचारी का स्वागत कर रहा है। वो भाई के साथ हमेशा के लिए महल छोड़कर चला जाता है। इधर राजदूत अश्वग्रीव के पास जाकर क्या समाचार देता है ये आगे पता चलेगा।

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