पहले प्राप्त करें फिर प्रदान करें, किसी विद्वान की चार पंक्तियां हैं- मुनि रजतचंद्र विजय

क्षमापना लेख – मोहनखेड़ा वाले आचार्यदेव श्री ऋषभचंद्र सूरीश्वरजी म.साहेब के शिष्य प्रवचनदक्ष प.पू. मुनिराज श्री रजतचंद्र विजयजी म.सा.

मा ह्रदय की करुणा, जीवन की साधना है.
क्षमा शांति की नींव,धर्म की आराधना है.
अधरों के उच्चारण से क्षमा नहीं होती,
क्षमा अभिनय नहीं, क्षमा उपासना है.
कोई वस्तु हमारे पास यदि होगी तो हम उसे दे पाएंगे नहीं होगी तो कैसे दे पाएंगे. इसलिए यह आवश्यक है कि पहले उस वस्तु को प्राप्त किया जाए. यदि क्षमा हमारे पास होगी तो हम उसे दूसरों को दे पाएंगे इसलिए पहले क्षमा प्राप्त करें, की हुई भूलों के लिए क्षमा याचना करें, फिर क्षमा प्रदान करें.
संसार भूलों से भरा है, उलझनो से भरा है, विचित्रताओ से भरा है तो दुर्भावनाओं से भी भरा है. यह आवश्यक नहीं है कि जो मुझे अच्छा लगता हो, वह दूसरों को भी अच्छा लगे. जबकि सत्य यह है एक व्यक्ति की पसंद दूसरे व्यक्ति की नापसंद बन जाती है. एक व्यक्ति का सुख दूसरे के लिए दुख का कारण बन जाता है. आपसी संबंधों में बोलचाल में एक दूसरे के दिल को ठेस पहुंचती है.क्षमा याचना करके हमारे द्वारा की गई भूलों को दूर किया जा सकता है. कभी-कभी हम अहंकार वश त्रुटियों को अनदेखा कर देते हैं. इस वजह से दिलों की दूरियां बढ़ती ही जाती है. मन में द्वेष भावना उत्पन्न होती है. अनजाने में कोई ऐसा कार्य हमारे द्वारा हो जाता है जिससे सामने वाले के दिल को ठेस पहुंचा देते हैं या हमारे द्वारा कोई कार्य ऐसा हो जाता है जिससे सामने वाला व्यक्ति हमसे नाराज हो जाता है. इसलिए हमें क्षमा याचना कर लेना चाहिए.
मनुष्य को निरंहकार होना चाहिए.क्षमा उसी के पास होती है. क्षमा से दिलों की दूरियां समाप्त होकर प्रेम और मित्रता के भाव उत्पन्न होते हैं.
अहंकारी व्यक्ति के लिए क्षमा मांगना कठिन है और क्षमा कर देना भी कठिन है. क्षमा प्राप्त करने के लिए अहंकार का त्याग करना पड़ेगा, मन को निष्कपट बनाना पड़ेगा, कुछ पल के लिए स्वयं को छोटा बनाना पड़ेगा.
क्षमा हमारे द्वारा की गई भूलों का प्रायश्चित है, पश्चाताप है, दिल से वैर भाव मिटाने का माध्यम है. ह्रदय की संवेदना है. क्षमा दान करना अर्थात पूर्व की भांति संबंध स्थापित करना है.
भगवान महावीर ने कहा है – खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतू में.
मित्ति में सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणई.
सभी जीवो से मै क्षमापना करता हूं. सभी जीव मुझे क्षमा करें. सभी जीवो के साथ मुझे मैत्री भाव है, किसी भी जीव के साथ वैर भाव नहीं है. इन भावों को हमें अपने ह्रदय में रखना चाहिये।

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