प्रथम अध्याय – कर्म की सिद्धि

  • त्रिपथगा में कर्म सिद्धान्त
  • संकलनकर्ता – शैलेन्द्र कुमार जैन
  • 334 , हाईलिंक सिटी , इन्दौर मो. 9425413847, 7000154181

राजा हो या रंक, सेवक हो या स्वामी, श्रमिक हो या अश्रमिक, बुद्धिमान् हो या मूर्ख, युवक हो या वृद्ध सभी की जिव्हा पर ‘कर्म’ शब्द का साम्राज्य रहा हुआ है। विचारक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, कवि, लेखक, पत्रकार, साहित्यकार, तत्वचिन्तक, शिल्पी, श्रमजीवी, समाजसेवी, राज्यसेवी एवं सभी प्रकार के व्यवसायी येन-केन-प्रकारेण कर्म से प्रभावित हैं।
धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, शब्दशास्त्र, समाजशास्त्र और नीतिशास्त्र में ‘कर्म’ शब्द विभिन्न प्रवृत्तियों के रूप में प्रयुक्त होता है। भारत धर्म प्रधान देश है। सभी आस्तिक दर्शनों और धर्मों ने ‘कर्म’ की सत्ता को स्वीकार किया है जो आत्मा की शुद्धता को एवं उसकी विभिन्न शक्तियों को व गुणों को प्रभावित, आवृत तथा कुंठित कर देता है।
भारतीय दर्शनों ने कर्म’ के विभिन्न नाम दिए हैं। जैसे वेदान्त दर्शन ने कर्म को माया या अविद्या कहा है। सांख्य दर्शन ने इसे ‘प्रकृति’ या ‘संस्कार’ की संज्ञा दी है। न्याय दर्शन के अदृष्ट और संस्कार शब्द भी इसी कर्म के द्योतक है। बौद्ध दर्शन में कर्म वासना और अविज्ञप्ति के नाम से स्पष्ट है। वैशेषिक दर्शन में प्रयुक्त धर्माधर्म शब्द भी जैन दर्शन के कर्म शब्द का समानार्थक है। शैव दर्शन में पाश शब्द कर्म का पर्यायवाची है। योग दर्शन में इसके लिए ‘क्लेश’ या कर्म – आशय शब्द का प्रयोग किया गया है। मीमांसा दर्शन का ‘अपूर्व’ शब्द भी कर्म के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। जैन दर्शन में कर्म के साथ ‘कर्म-मल’ या कर्म-रज आदि शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। दैव, भाग्य, पुण्य पाप आदि अनेक शब्द कर्म के रूप को व्यावहारिक जन-जीवन में झलकाते हैं।
भारतीय दर्शन गंगा की भाँति तीन प्रमुख धाराओं से सम्पन्न हैं जैसे वैदिक-दर्शन, बौद्ध दर्शन एवं जैन दर्शन आदिकाल से ही इन तीनों की पावन विचार गंगा प्रवाहित है। इन तीनों की चिन्तन धाराएँ हिमालय के श्रृंगों से भी ऊँची, समुद्र की गहराई से भी अधिक गहन तथा आकाश से कहीं अधिक विशाल हैं। इसमें भी जैन चिन्तन धारा का अनुपम स्थान है क्योंकि जैन कर्म सिद्धान्त मानव के व्यावहारिक जीवन को जीने व समझने के लिए परमोपयोगी है।
वैदिक-दर्शन में कर्म-सिद्धान्त
मनुस्मृति में लिखा है, ‘कर्म के कारण मनुष्य को उत्तम, मध्यम या अधम गति प्राप्त होती है। मन, वचन और शरीर के शुभ कर्मों के योग से प्राणी देव योनि को प्राप्त होता है, मिश्र कर्मयोग से वह मनुष्य योनि में जन्मता है और अशुभ कर्मों के कारण वह पशु-पक्षी योनि में उत्पन्न होता है।’ ‘विष्णु पुराण’ में कहा गया है, ‘आत्मा न तो देव है, न मनुष्य है, न पशु है और न वृक्ष है। ये भेद तो कर्मजन्य शरीर की कृतियों का है।
इसी प्रकार ऋग्वेद में ‘कर्म’ शब्द चालीस बार से अधिक प्रयुक्त हुआ है, कहीं इसका अर्थ है पराक्रम तो कही उसका अर्थ है वीर कार्य। हालांकि वैदिक परम्परा में वेदों से लेकर ब्राह्मण ग्रंथों तक यज्ञ-याग आदि नित्य नैमित्तिक क्रियाओं को कर्म कहा गया है। पौराणिकों के मत में व्रत नियम आदि धार्मिक क्रियाएँ कर्म कहलाती हैं। श्रीमद्भागवत गीता में फलाकांक्षा रहित होकर अनासक्त भाव से या समर्पण भाव से कृत कर्म या ज्ञानयुक्त कर्म आदि सभी प्रकार के क्रियाओं के व्यापक अर्थ में कर्म शब्द प्रयुक्त है।
वेदान्त में अज्ञान को कर्मबन्ध का मूल कारण बताया गया है और अज्ञान के कारण ही ये जीव संसार चक्र में बंधा हुआ है। गीता के अनुसार कर्म तीन प्रकार के हैं कर्म, विकर्म और अकर्म । कर्म और विकर्म अन्धकारक हैं और अकर्म बन्धकारक नहीं है। जो शुभ कार्य फल की इच्छा से किये जाते हैं वे कर्म हैं। जो अशुभ कार्य कामनाओं की पूर्ति के लिये किये जाते हैं वे विकर्म है। जो शुभ कार्य फलासक्ति रहित होकर मात्र कर्तव्य बुद्धि से किये जाते हैं वे अकर्म है। गीता के अनुसार अभिन्न भाव से परमात्मा में सिद्ध होकर और कर्तापन के अभिमान से रहित होकर जो कार्य किया जा सकता है वह मुक्ति के अतिरिक्त अन्य फल नहीं देता इसलिए वह अकर्म है।
महाभारत के शान्तिपर्व में कर्मफल के सम्बन्ध में लिखा है, जिस प्रकार गाय का बछड़ा हजार गायों में अपनी माँ को ढूँढ लेता है और उसका अनुसरण करता है, उसी प्रकार पूर्वकृत कर्म कर्ता का ही अनुसरण करते हैं। सारार्थ यह है, कर्म व्यक्ति की परछाई के समान साथ जाते हैं। और समय आने पर उसका सुख-दु:ख रूप फल भी मिलता है।
रामायण ने स्पष्ट प्रकाशित किया है, शरीरधारी जीव स्वयं शुभ या अशुभ कर्म करता है और स्वयं ही उनके फलस्वरूप सुख-दु:ख को भोगता है। यह जगत कर्मभूमि है, इसमें मनुष्य शुभ कर्मों का शुभ और अशुभ कर्मों का अशुभ फल पाता है किये हुए कर्मों का फल भोगे बिना छुटकारा नहीं हो सकता। अत: ‘जैसा कर्म वैसा फल’ इस बात का ज्ञान हमें कर्ममुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिये प्रेरित करता है।
क्रमश:
कल का जबाब : मोह
आज का सवाल : महाभारत के एक पर्व का नाम क्या ? जिसमें कर्मफल बताएं है ।