नाशवान वस्तु के पीछे मनुष्य का क्रोध करना मूर्खता

रतलाम । संसार का प्रत्येक प्राणी जो जन्म लेता है उसका एक न एक दिन अंत होता है सुंदर और मजबूत आकर्षक शरीर अंतत गत्वा भस्म अथवा राख में विलीन होता है यह आपके कर्मों पर निर्भर करता है कि आप भस्म बनना चाहते हैं अथवा राख विनाशवान जीवो के लिए क्रोध करना युद्ध करना संघर्ष करना मूर्खता और मिथ्या कारक है हमारी ऊर्जा, सदकार्यों में खर्च होना चाहिए । निरर्थक वाद विवाद हमें सकारात्मक और कल्याण के मार्ग से भटकाता है हमारी शक्ति और सामर्थ्य का प्रयोग समाज धर्म और मनुष्यता की रक्षा में होना चाहिए ।
उपरोक्त विचार उत्तराखंड से पधारे संत शिरोमणि प्रखर वेद वाणी मर्मज्ञ महाराज निर्मल चैतन्य महाप्रभु जी ने प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. मुरलीधर चांदनी वाला के निवास स्थान पर शिक्षक सांस्कृतिक संगठन एवं अन्य गणमान्यजन द्वारा आयोजित व्याख्यान एवं सम्मान समारोह में व्यक्त किए । आपने रामचरितमानस मैं वर्णित श्री राम, महारानी कैकई और राजा दशरथ के मार्मिक संवादों का चित्रण करते हुए कहां की कैकई द्वारा मांगे गए वरदानों से राजा दशरथ मूर्छित और निरुत्तर हो गए थे । उनकी दशा अत्यंत दयनीय और असहाय हो गई थी तब महारानी कैकई ने भगवान श्रीराम से कहां की आपके पिता द्वारा दिए गए वचन का पालन करना आपका धर्म है पिता की आज्ञा का पालन करना राजा दशरथ जी के लिए स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करेगा, अन्यथा वे वचन भंग का दोष पाकर मुक्त नहीं हो पाएंगे । तब लक्ष्मण जी ने क्रोधित होकर केकई को मारने का निश्चय कर लिया तब भगवान श्रीराम ने उन्हें समझाते हुए कहा कि हमें विनाषीय व्यक्तियों के प्रति क्रोध बिल्कुल नहीं करना चाहिए । पृथ्वी पर आने का हमारा उपदेश क्रोध करना नहीं अपितु मर्यादाओं तथा सामाजिक विधान स्थापित करना है, मनुष्यता और समाज की रक्षा तभी की जा सकती है जब हम संयमित और धैर्य के साथ परिस्थितियों का सामना कर पाएंगे।
स्वामी जी ने कहा कि व्यक्ति को अपना स्वभाव निर्मल और स्वच्छ रखना चाहिए चाटुकारिता और झूठी प्रशंसा से मुक्त व्यक्तित्व ही अपने जीवन की सार्थकता को प्राप्त कर पाता है हमारा आत्मबल और पुरुषार्थ शक्तिशाली बनाना चाहिए । दूसरों के व्यक्तित्व और सामर्थ्य का उपयोग कमजोर व्यक्ति करते हैं हमारे कर्म विश्वसनीय और सकारात्मक होना आवश्यक है । तभी हम समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त कर सकते हैं वैचारिक दृढ़ता और इंद्रियों की संयमता मनुष्य की लिए अत्यंत आवश्यक है ।
आपने कहा कि वर्तमान परिदृश्य में साधु संत प्रचार-प्रसार के लालच में व्यर्थ और अकारण विवादों में फस जाते हैं संतो को सनातन संस्कृति और सभ्यता का संवाहक माना जाता है इसके लिए उन्हें स्वयं सदैव जागृत और समाज को भी जागृत रखना होगा तब हम हमारी सनातन सभ्यता और संस्कृति की रक्षा कर पाएंगे । आपने शिक्षकों और गुरुजनों के लिए कहा कि समाज में अज्ञानता का अंधेरा केवल शिक्षक ही समाप्त कर सकता है संतो के बाद शिक्षक ही समाज को अपने आचरण तथा कर्तव्यों से प्रभावित कर सकता है समाज से अज्ञानता और अराजकता नष्ट हो यह आपकी सबसे बड़ी गुरु दक्षिणा होगी । आरंभ में डॉ. मुरलीधर चांदनी वाला, प्रतिभा चांदनी वाला, श्री कालूलाल जमडा, दिनेश शर्मा, गोपाल जोशी, रमेश उपाध्याय, भारती उपाध्याय, राधेश्याम तोगड़े, श्याम सुंदर भाटी, अनिल जोशी, कविता सक्सेना, रक्षा के कुमार, नूतन मजावदिया आदि ने स्वामी जी को शाल श्रीफल देकर सम्मानित किया । स्वामी निर्मल चैतन्य महाप्रभु उत्तराखंड निवासी होकर भारत भ्रमण पर है अपने सनातन धर्म पर अनेकों पुस्तकें लिखी है तथा वैदिक ज्ञान और शास्त्रों के प्रखर प्रणेता के रूप में अपने प्रवचन प्रदान करते हैं।

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