- झारखण्ड राजकीय अतिथि श्रमण जैन मुनि श्री 108 विशल्य सागर जी मुनिराज का कोडरमा प्रवास पर लेख
- 1 नवंबर को शाकाहार दिवस पर मुनि श्री का लेख

यह एक सर्वमान्य और सर्व स्वीकार्य तथ्य है कि जैसे हमें अपनी जान प्यारी है ,वैसे ही संसार में हर जीव को अपनी जान प्यारी होती है। इसलिए कभी किसी प्राणी का अपने अपने स्वाद, स्वार्थ और शौक के लिए संकल्प पूर्वक वध नहीं करना चाहिए ।केवल धर्म -दृष्टि से ही नहीं ,अपितु नीति की दृष्टि से भी अहिंसा का यह सिद्धांत तर्कसंगत, सार्वभौमिक और समाधान कारी है। अहिंसा एक व्यापक अर्थ वाला शब्द है ।दुनिया में समस्त श्रेष्ठ ताओं की बुनियाद में अहिंसा की भावना कार्य करती है ।अहिंसा के अनेक चरण हैं ।उनमें से प्रथम चरण है आहार में अहिंसा अथवा अहिंसक आहार । मन जिसके आहार में ही क्रूरता है ,उसके जीवन से करुणा की धारा कैसे बहेगी ?प्रश्न है वह अहिंसक आहार, क्रूरता रहित आहार कौन सा है? इस प्रश्न का सुस्पष्ट ,सरल और सर्वमान्य उत्तर है – शाकाहार ।शाकाहार मानव सभ्यता और संस्कृति का मंगलाचरण है। शाकाहार सिर्फ आहार ही नहीं, अपितु मानवीय जीवन प्रणाली है। एक ऐसी जीवन प्रणाली जिसमें मानव मानव के बीच तथा मानव और पशु पक्षियों के बीच सह अस्तित्व पूर्ण संबंधों का सम्मान है ।
देश और दुनिया के अनेक सामानों में शाकाहार सामुदायिक जीवन प्रणाली के रूप में सुस्थापित है ।अहिंसा की सामूहिक साधना के रूप में शाकाहार चिरकाल से मानव का और मानव समान का आहार बना हुआ है ।मानव के लिए शाकाहार एक सामाजिक आहार ही नहीं, अपितु वैज्ञानिक आहार भी है ।इसकी वैज्ञानिकता कई दृष्टियों से सिद्ध है और आधुनिक शोधों व प्रयोगों में भी शाकाहार की उपयोगिता स्थापित हुई है ।प्रकृति ,पर्यावरण आत्म -विद्या ,शरीर विज्ञान ,आयुर्विज्ञान आदि दृष्टियों से शाकाहार की उपयोगिता सर्व विदित है ।शाकाहार मनुष्य के सिर्फ शरीर को ही पोषण नहीं देता है ,अपितु वह मन मस्तिष्क और आत्मा को भी तृप्त करता है।
आधुनिकता की होड़ में अपनी संस्कृति आचार -विचार सब को दकियानूसी कहने वाले इस झूठी अवधारणा के शिकार हो रहे हैं कि शाकाहारी भोजन से उचित मात्रा में प्रोटीन अथवा शक्ति वर्धक उचित आहार प्राप्त नहीं होता ।यह मात्र भ्रांति है ।आधुनिक शोधकर्ताओं व वैज्ञानिकों की खोजों से यह साफ पता लगता है कि शाकाहारी भोजन से ना केवल उच्च कोटि के प्रोटीन प्राप्त होते हैं, अपितु अन्य आवश्यक पोषक तत्व विटामिन ,खनिज, कैलोरी आदि भी अधिक प्राप्त होते हैं सोयाबीन व मूंगफली में मांस व अंडे से अधिक प्रोटीन होता है ।सामान्य दालों में भी प्रोटीन की मात्रा कम नहीं होती ।गेहूं ,चावल, ज्वार ,बाजरा ,मक्का आदि के साथ यदि उचित मात्रा में दाल एवं हरी सब्जियों का सेवन किया जाए तो ना केवल प्रोटीन की आवश्यकता पूर्ण होती ,अपितु अधिक संतुलित आहार प्राप्त होता है, जो शाकाहारी व्यक्ति को मांसाहारी की अपेक्षा अधिक स्वस्थ, सबल व दीर्घायु प्रदान करता है। मांस का तो अपना कोई स्वाद भी नहीं होता ,उसमें जो मसाले ,चिकनाई आदि अनेकों पदार्थ मिलाए जाते हैं उनका ही स्वाद होता है जबकि शाकाहारी पदार्थों फल ,सब्जी , मेवें आदि में अपना अलग स्वाद होता है और बगैर किसी मसाले आदि के वे स्वाद से खाए जाते हैं।
पशु सृष्टि की ओर ध्यान देने पर हम देखते हैं कि सर्वाधिक शक्तिशाली परिश्रमी व सहनशीलता वाले पशु लगातार कई दिन तक काम कर सकते हैं जैसे – हाथी ,घोड़ा ,बैल, ऊँट आदि सब शाकाहारी ही है ।इंग्लैंड में परीक्षण करके देखा गया है कि स्वाभाविक मांसाहारी शिकारी कुत्तों को भी जब शाकाहार पर रखा गया तो ,उनकी बर्दाश्त शक्ति व क्षमता में वृद्धि हुई ।एवरेस्ट विजेता तेनजिंग ने शेरपाओं की शक्ति का रहस्य उनका शाकाहारी होना ही बताया है ।अनेक अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी भी अब मांसाहार का परित्याग का परित्याग कर शाकाहार की ओर बढ़ रहे हैं।
अनेक शोधकर्ताओं ने यह पता लगाया कि शाकाहारी अधिक सहनशील, शक्तिशाली ,परिश्रमी अधिक वजन उठा सकने वाले ,शांति स्वभाव के व खुशमिजाज होते हैं ।वे अधिक समय तक भूख पर काबू रखने व लंबे उपवास की क्षमता रखते हैं ।जापान में किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि शाकाहारी न केवल स्वस्थ व निरोग रहते हैं अपितु दीर्घ जीवी भी होते हैं उनकी बुद्धि भी अपेक्षाकृत तेज होती है ।
वैज्ञानिक और चिकित्सक यह चेतावनी दे रहे हैं कि मांसाहार कैंसर आदि असाध्य रोगों को जन्म देता है, जबकि शाकाहार रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है । यह एक भांत धारणा की शाकाहारी भोजन से पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक तत्व प्राप्त नहीं होते हैं । आधुनिक खोजो से यह साफ पता चलता है कि शाकाहारी भोजन से ना केवल उच्च कोटि के प्रोटीन प्राप्त होते हैं ,अपितु अन्य आवश्यक पोषक , विटामिन ,खनिज ऊर्जा अधिक प्राप्त होते हैं मांसाहार करने वाले लोगों की अवधारणा की मांस खाने से आदमी हष्ट -पुष्ट व ताकतवर होता है, परंतु यह धारणा मिथ्या और भूल भरी है । स्पष्ट है कि शाकाहारी प्राणी अधिक बलवान ,ताकतवर और सहिष्णु होते हैं।
हम एक घोड़े का उदाहरण ले । घोड़ा घास, चने, दाने आदि खाता है । वह 50 घंटे तक अ विराम दौड़ सकता है ।इसलिए रेस घोड़ों की होती है । घोड़ा ना बैठता है, ना लेटता है । छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, झांसी रानी लक्ष्मीबाई ,अमर सिंह , इन सबके जीवन में घोड़ों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ,! घोड़ों के बल पर उन्होंने ना केवल अपने आप ही रक्षा की बल्कि पूरे देश की सुरक्षा में घोड़ों का योगदान रहा ।इतिहास साक्षी है कि35 फिट रुध खाई को लगने वाला चेतक घोड़ा ही था।
शाकाहार मानव सभ्यता संस्कृति और मानवता का अरुणोदय है । कृषि व खेती-बाड़ी के माध्यम से मानव ने शाकाहारी जीवन शैली को व्यवस्थित और सामाजिक रुप स्वरुप प्रदान किया । भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक इतिहास देखें प्रिया भारत दूध घी की नदियों वाला सरसब्ज कृषि प्रधान देश रहा । आज भी भारत एक कृषि प्रधान देश है । पाश्चात्य देशों से तुलना करें तो जब वे जंगली अवस्था में थे । तब यहां सभ्यता ,संस्कृति , , मूर्तिकला वास्तु आदि चरम अवस्था पर थी उस स्वर्णिम काल को देखें तो पाएंगे कि वे समुन्नत जातियां प्रजातियां मांसाहारी नहीं थी । उनकी प्रकृति और स्वभाव की खोज करें तो पाते हैं कि वे शांत धीर धीर गंभीर दयावान बुद्धिमान रहे आज की वैज्ञानिक शोधों ने निष्कर्ष निकाल दिए हैं कि ऐसे सद्गुणों का विकास सहकारी में ही हो सकता है।