- जन्म जयन्ती पर विशेष
- प्रस्तुति : विजय कुमार लोढा निम्बाहेड़ा (पूणे)
आचार्य श्री खुब चंद जी म.सा. का जन्म निम्बाहेड़ा (राज) में संवत 1930 की कार्तिक शुक्ला अष्ठमी को हुआ आपके पिताश्री श्री टेक चंद जी जेतावत व मातुश्री धर्म परायण श्री गेंदी बाइ थी! आप बचपन से ही गम्भीर व शान्त स्वभावी थे !16 वर्ष की उम्र में आपका विवाह अठाना(म. प्र) निवासी श्री देवीलाल जी सा बोहरा की सुपुत्री साकर कुंवर के साथ संवत 1946 की मगसर शुक्ला पूणिमा को सम्पन्न हुआ । आपकों बचपन से ही सन्त मुनिराजो के साथ रहने का व प्रवचन सुनने की रुचि थी । आपकी उम्र जब बीस वर्ष की हुई आपको वेराग्य भाव जागृत हुआ एवम हृदय में एसा विचार आया कि मुजे अब सांसारिक कार्यों में रुचि नही रखना है व सन्त जीवन स्वीकार करना हे । वेराग्य भाव प्रकट होने की भी एक घटना हे आप जब सोये हुए थे आपके पिताश्री ने कहा खुबा उठ अभी तक सोया हे ओर दिल में यह भावना जागृत हुई कि में वास्तव में सोया हुआ हूं मुजे जगना चाहिये ओर आत्म कल्याण की ओर बढ़ना चाहिये । एक दिन हिम्मत करके अपने पिताश्री के समक्ष हिम्मत करके यह बात रख ही दी परिवार में एकदम हलचल मचगइ! सभी परिजनो ने बहुत समजाया पर वेराग्य का एसा रंग था कि उतरने का नाम ही नही था । दो वर्ष ऐसे ही चलते रहे ओर घर वालो ने दीक्षा की आज्ञा प्रदान करदी एवम संवत 1952 की असाढ़ शुक्ला तीज को महान उपकारी , वादीमान मर्दक पूज्य श्री नंदलाल जी म.सा के पावन सानिध्य में उदयपुर में जैन भगवती दीक्षा ग्रहण करली! दस वर्ष बाद आपकी पत्नी ने भी दीक्षा ग्रहण की जो महासती श्री साकर कुंवर जी के नामसे जाने गये।
गुरु जैन दिवाकर जी व आचार्य श्री खूब चंद जी महाराज साथ साथ वैरागी रहे व ज्ञान सीरवा
श्री खूब चंद जी म.सा ने संयम लेते ही गुरु जी के संग रहते बहुत ही ज्ञानाभ्यास किया व आगमो का गहन अध्ययन किया , प्राकृत व संस्कृत भाषा का विशेष रूप से अध्ययन किया । आप थोड़े ही समय में बहुत हो मजे हुए प्रवचनाकार बन गये । आप गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित एवम बहुत धेर्यवान थे, कोइ भी बात सामने आती तो उसको बहुत ही गम्भीरता से समज कर शान्त भाव से उसका हल निकालने का प्रयास करते। आपकी इसही विशेषता से जब संवत 1990 का अजमेर साधु सम्मेलन अजमेर में हुआ तब सम्प्रदाय के प्रतिनिध रूप में आप वंहा पधारे व अपने व्यहवार व परामर्श से अन्य सम्प्रदायो के सन्तो का दिल जीत लिया। पूज्य श्री हुकमी चंद जी म.सा के पाट परम्परा के पांचवे आचार्य अखण्ड यशधारी श्री मन्ना लाल जी म.सा का देवलोक गमन होगया तो सभी संतमुनिराजो व संघ की सहमति से आपको संवत 1991 की चेत्र शुक्ला तीज को आचार्य पद पर आसीन किया। कहते है कि सम्प्रदाय में पाट के मालिक आचार्य प्रवर श्री खूब चंदजी म.सा व ठाठ के मालिक जैन दिवाकर श्री चौथमल जी म.सा थे। दोनो सन्तो की युगल जोड़ी से सम्प्रदाय का पुरे देश में सुयश फैला ।
आचार्य श्री खूब चंद जी म.सा के मुखारविंद से जैन दिवाकर की पदवी
आचार्य श्री खुब चंद जी म.सा जब मन्दसौर में विराजमान थे आपके श्री मुख से चौथमल जी म.सा को जैन दिवाकर की पदवी प्रदान की गइ आज आप देखिये की आज मुनि श्री को चौथमल जी महाराज के नामसे कम पहचानते हे व जैन दिवाकर के नामसे ज्यादा पहचानते हे।
प्रमुख कविवर के रूप में पहचान
आपने कई स्तवनो, लावणीयो, चारित्रो की रचना लोकभाषा में करी आजभी पुराने श्रावक जब गाते है जुम जाते है । आपकी कविता का एक संग्रह खुब कवितावली के नामसे प्रकाशित हुआ है बहुत ही गजब की रचनाए हे। उनकी एक रचना बहुत प्रसिद्ध हे उसका कुछ अंश आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं
मत भूलो कदा रे मत भूलो कदा, वीर प्रभु का गुण गाओं सदा
जल से नहाया तन मेल हटे, प्रभु जी की वाणी से पाप कटे
मत भूलो कदा जी मत भूलो कदा
जैन दिवाकर गुरुदेव ने व आचार्य श्री खूब चंद जी म.सा ने संयुक्त रूप से , दान, शील, तप, भावना पर सुंदर लावणीये लिखी हे , जिनको सुन कर होठ थिरकने लगते है ।
आचार्य श्री खूब चंद जी म.सा के प्रमुख शिष्य , उपाध्याय श्री कस्तुर चंद जी म.सा , सलाहकार श्री केसरी मल जी म.सा, सुख लाल जी म.सा., हजारी मल जी म.सा., हर्ष चन्द जी म.सा हे! मेवाड़ भूषण प्रताप मल जी म.सा आपके गुरु भ्राता थे ।
दिल्ली संघ की विनती पर आप काफी समय दिल्ली बिराजे , ब्यावर संघ की पुरजोर विनती स्वीकार करके आप दिल्ली से विहार कर ब्यावर पधारे व वंहा आपका स्वास्थ नरम होगया व संवत 2002 की चेत शुक्ला तीज को आप देवलोक पधारे! आपके आचार्य काल में जिन शासन की बहुत प्रभावना हुइ । एसे महान सन्त की 149 वी जन्म जयन्ती के पावन प्रसंग पर अनेकानेक वंदन ।