
रतलाम। आगामी कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा 8 नवंबर के चंद्रग्रहण का कुछ स्थूल (सौर ) गणितयुत पंचांगों में उल्लेख नहीं होने से जनमानस में संशयात्मक स्थिति उत्पन्न हो गई है , जबकि वेधसिद्ध सूक्ष्म दृश्यगणितगत पंचांगों में समग्र भारत में सांय चंद्रोदय काल से विभिन्न स्थानों में चंद्रग्रहण होने का स्पष्ट उल्लेख किया गया है ।
पंचांग निर्माण की अनेक विधियां प्रचलित रही है प्रमुख रूप से सूर्यसिद्धांत , ग्रहलाधव , मकरन्द तथा केतकी दृश्यगणित आदि इनमें पञ्चाङ्गगीय परिगणित किया जा सकता है , समय-समय पर सिद्धांत ज्योतिष के प्रमुख आचार्यों ने पंचांग निर्माण पद्धति में परिवर्तन परिवर्धन कर सूक्ष्म गणित का आधार लिया है ।कुछ सौर पंचांग की चतुर्थ शताब्दी तथा पन्द्रहवीं सदी की गणित पद्धति होने से आज ये सौर गणित की प्राचीन स्थिति किसी भी वेधशाला के आधुनिक सूक्ष्म यंत्रों के सम्मुख स्थूल होकर सान्तरिक हो गई है , कतिपय सौर पंचांगों क़े गणित के निष्कर्षों के आधार पर दोनों पद्धतियों में तिथियों में 6 घंटे तक , सूर्य चंद्र ग्रहण में स्पर्श तथा मोक्ष काल में एक डेढ़ घंटे तक , ग्रहों के स्पष्ट काल में अनेक अंशों का तथा गुरु शुक्र के उदयास्त काल में कई दिन का अंतर आने के कारण प्राचीन कुछ सौर पंचांगों की सौरगणित की स्थूलता ( अशुद्धता ) वेधयंत्रों से प्रत्यक्ष रूप से दिखती है ।
वर्षों से इनमें किसी भी प्रकार की संशोधन ना होने के कारण विविधता देखने को मिलती है । वही संशोधित सिद्धांत ज्योतिष ग्रंथों से निर्मित केतकी चित्रापक्षीय दृश्यगणित युक्त पंचांग का तिथि नक्षत्र आदि मान सूर्यादिग्रहों के स्पष्टकाल सूर्य चंद्र ग्रहण के प्रारंभ व मोक्षकाल तथा अन्य पंचांगीय सिद्धांतों का गणितीय निष्कर्ष वेधशाला से उपलब्ध परिणाम में लगभग एकरूपता है , जबकि कुछ सौर पद्धति के पंचांगों का गणितीय निष्कर्ष स्थूल होने एवं वेधसिद्ध नहीं होने पर सिद्धांत ज्योतिष के सभी प्रकारों में तिथि नक्षत्र आदि ग्रहस्पष्ट ग्रहों के उदयास्त एवं ग्रहणों के कालों व अन्यान्य क्षेत्रों में अत्यधिक अंतर स्पष्ट दिखाई देता है ,
सूर्य के परिभ्रमण के कारण कालांतर में इन पंचांग में अंतर आ गया कुछ पंचांग ने इनमें सुधारकर वेदसिद्ध प्रमाण प्राप्त किये पर कुछ पंचांग सुधार न कर सके व वेदसिद्ध प्रमाण नहीं करने के कारण यह त्रुटिया आज भी बरकरार है ,
इसी कारण सौर दृश्यपंचांगों में अनेक बार तिथि पर्वो में भारी अंतर आने से सामान्यजन दिग्भ्रमित हो जाता है तथा पंचांगों पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाते हैं ,
भारतवर्ष में 90 प्रतिशत से अधिक चित्रापक्षीय सूक्ष्म दृश्य गणित अनुसार पंचांग प्रकाशित होते हैं केवल कतिपय सौरपंचांगों के कारण तिथि पर्वो में अंतर आने से संदेहास्पद स्थिति निर्मित हो जाती है ।
कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा 8 नवंबर को भारत के सभी चित्रापक्षीय दृश्यगणित युत पंचांगानुसार ग्रस्तोदिक चंद्रग्रहण होगा, जबकि कुछ सौर पंचांगों में उक्त चंद्रग्रहण के दृश्य (दिखने) होने की विवेचना नहीं की है जो स्थूलता ( वेधसिद्धरहित , अशुद्धता ) का परिचायक है ।
इस ग्रस्तोदय चंद्रग्रहण का स्पष्टकाल दिन में 2:39 तथा मोक्ष (समाप्ति) काल सांयकाल रात्रि में 6:19 पर होगा , विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न चंद्रोदय काल सूर्यास्तअंतर से लेकर 6:19 तक चंद्रग्रहण का पर्व काल होगा ,
पूर्वीभारत (असम ,प.बंगाल, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश में कहीं-कहीं डेढ़ घंटे से अधिक यह चंद्रग्रहण दिखाई देगा । उज्जैन-इंदौर में चंद्रोदय के समय सांय 5:43 मिनट से ग्रहण आरंभ होकर 6:19 मिनट पर समाप्त होगा जिसका पर्व काल 36 मिनट का रहेगा ।
इस परिप्रेक्ष में शासकीय जीवाजी वेधशाला उज्जैन द्वारा दिनांक 1 नवंबर 2022 को प्रकाशित ग्रहण होने की सूचना पत्र से दृश्यगणित से ग्रहण होने की प्रमाणिकता सिद्ध होती है यह ग्रहण ग्रस्तोदिक होने से ग्रहण पर्वकाल प्रारम्भ होने के 12 घंटे पूर्व अर्थात सूर्योदय पूर्व 5:43 से ग्रहण क़ा सूतक (वेध) काल आरंभ हो जाएगा ।
डॉ.( प्रो.) विष्णु कुमार शास्त्री
पूर्व प्राचार्य-शासकीय महाविद्यालय जावरा
सिद्धविजय पञ्चाङ्ग निर्माणकर्ता
कुछ पंचांगकर्ताओ की त्रुटि क़े चलते मूल भूमिगत धरातल स्तर पर वैदिक विधान कार्य करने वाले विप्रबंधु मंदिरों में पूजा करने वाले ब्राह्मणदेव पंडितजी को इसका परिणाम भुगतना पड़ता है , अधिकांश पूजन कराने वाले विप्रबन्धु पंचांग की सूक्ष्मतम गणित से अनभिज्ञ रहते हैं , तथा सभी विप्रबन्धु ब्रह्मदेव अपने-अपने अनुसार प्रथक-प्रथक पञ्चाङ्ग क़ा उपयोग करते हैं , एक ही स्थान से निकले वाले कुछ पंचांगों में भी भिन्नता देखने क़ो मिलती हैं ।
जनमानस सीधे तौर पर ब्राह्मणदेव , मंदिरों की सेवा कर रहे पंडितजी से प्रत्यक्ष सवाल करती है और इन्हें हंसी का पात्र बनाया जाता है तब असमंजस की स्थिति में इन्हें काफी अपमानित भी होना पड़ता है समाज में इस प्रकार की स्थिति न हो इसके लिए कई बार अधिकांश पंचांग निर्माणकर्ता से अनुरोध प्रत्यक्ष व पत्र द्वारा भी किया गया है परन्तु सामंजस्य एकरूपता स्थापित न हो सकी , कुछ पंचांग निर्माणकर्ता के चलते समस्त विप्रबन्धु को अपमानित और लज्जित जनमानस के समक्ष होना पड़ता है ।
ज्योतिषाचार्य पं.संजयशिवशंकर दवे , रतलाम