जिंदगी का भरोसा नहीं इसलिए परिग्रह न्यूनतम कर संयम-साधना अंगीकार करों- समकितमुनिजी

  • साध्वी संयमप्रभाजी के देवलोकगमन पर लोगस्स की आराधना एवं श्रद्धाजंलि सभा
  • समकितमुनिजी के सानिध्य में यश सिद्ध स्वाध्याय भवन में हुआ आयोजन

भीलवाड़ा (निलेश कांठेड़ मीडिया प्रभारी-समकित की यात्रा-भीलवाड़ा 2022) । आगम मर्मज्ञ, प्रज्ञामहर्षि डॉ. समकितमुनिजी म.सा. आदि ठाणा धन्यावाद यात्रा के तहत 12 नवम्बर शनिवार सुबह श्याम विहार से मंगलविहार करके सांगानेर रोड स्थित यश सिद्ध स्वाध्याय भवन पहुंचे। यहां धर्मसभा का आयोजन फतहनगर में मेवाड़ परम्परा की वरिष्ठ महासाध्वी संयमप्रभाजी म.सा. के देवलोकगमन होने के कारण स्थगित रख श्रद्धाजंलि सभा का आयोजन किया गया। इसमें मुनिश्री ने देवलोकगमन करने वाली महासाध्वीजी के दिवंगत आत्मा की मुक्ति के प्रार्थना के साथ श्रावक-श्राविकाओं से लोगस्स पाठ की आराधना कराई। उन्होंने दिवगंत साध्वी संयमप्रभाजी म.सा. को भावाजंलि अर्पित करते हुए कहा कि अंबेश गुरू परिवार से जुड़कर लंबे समय तक संयमी जीवन की पालना करने वाली महासाध्वी संयमप्रभा पूज्य सौभाग्यमुनिजी, मदनमुनिजी, प्रेमवतीजी म.सा. की शिष्या होकर सहजता व सरलता की मिसाल थी। उन्होंने दीर्धकालीन संयमित जीवन जीते हुए जिनशासन की प्रभावना की। संयम के साथ अंतिम समय में संथारापूर्वक आराधना करते हुए भव परिवर्तन किया। उन्होंने कहा कि इस जीवन का कोई भरोसा नहीं कब समाप्त हो जाए इसलिए सांसारिक सुखों से दूर होना शुरू करें और संयम व साधना से स्वयं को जोड़े। उन्होंने कहा कि पचास वर्ष का जीवन जीने के बाद व्यक्ति के पास अधिक समय नहीं होता है उसे परिग्रह न्यूनतम कर संयम व साधना को अंगीकार करना चाहिए। जिंदगी समाप्त होने पर परिग्रह की गई सामग्री नहीं आत्मकल्याण के लिए जो किया गया वह ही काम आएगा। मुनिश्री ने कहा कि हम भौतिक सुख पाने में जुटे हुए है लेकिन ये कभी नहीं सोचते है कि आत्मा का सुख कैसे प्राप्त करें। उन्होंने श्रावक के तीन मनोरथ का स्मरण कराते हुए कहा कि प्रत्येक श्रावक-श्राविका को सुबह उठते ही इन तीन मनोरथ को अवश्य स्मरण करना चाहिए ताकि उसे ध्यान रहे कि जिंदगी का अंतिम लक्ष्य क्या है। इन मनोरथ को किस तरह पूर्ण किया जा सकता ये सोच जिंदगी जीना चाहिए। हमे सोचना चाहिए कि हमे ये मानव जीवन किस लिए मिला है और जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है। उन्होंने कहा कि एक आत्मार्थी साधक का मनोरथ होता है कि अंतिम समय समाधि-मरण प्राप्त हो। संथारे का अर्थ है देहासिक्त छोड़कर आत्मा की अनुभूति करना। आत्मा और शरीर की भिन्नता का अहसास करते हुए समतापूर्वक शरीर को छोड़ना। श्रद्धाजंलि सभा के शुरू में उन्होंने राजस्थान सिंहनी महासाध्वी यशकंवरजी म.सा., महासाध्वी सिद्धकंवरजी म.सा. को याद करते हुए कहा कि ऐसी महान साध्वियां जिनशासन का गौरव बढ़ाने वाली रही है। उन्होंने महासाध्वी सिद्धकंवरजी म.सा. द्वारा रचित ‘‘उठ जाग मेरे चैतन्य प्रभु, तू अजर अमर अविनाशी है’’ भजन का गान कराते हुए कहा कि इसमें भी यही बताया गया है कि मानव देह आवरण मात्र है लेकिन आत्मा अजर-अमर अविनाशी है। श्रद्धाजंलि सभा में प्रेरणाकुशल भवान्तमुनिजी म.सा. एवं गायनकुशल जयवंतमुनिजी म.सा. का भी सानिध्य मिला। यश सिद्ध स्वाध्याय भवन श्रीसंघ के मंत्री मुकेश डांगी एवं संचालन कर रहे श्रीसंघ के सलाहकार भूपेन्द्र पगारिया ने संघ की ओर से दिवंगत महासाध्वी संयमप्रभाजी म.सा. को श्रद्धासुमन अर्पित किए। धर्मसभा में शांतिभवन श्रीसंघ के मंत्री राजेन्द्र सुराना, यश सिद्ध स्वाध्याय भवन श्रीसंघ के अध्यक्ष कैलाशचन्द्र बड़ोला, उपाध्यक्ष मानसिंह बंब, कोषाध्यक्ष हिम्मतसिंह खारीवाल, सहमंत्री राकेशकुमार बंब, यश सिद्ध महिला मंडल की अध्यक्ष रेखा नानेचा, मंत्री निकिता बंब, कोषाध्यक्ष सुनीता डांगी, शांति जैन महिला मंडल की अध्यक्ष स्नेहलता चौधरी, मंत्री सरिता पोखरना, महावीर युवक मंडल के अध्यक्ष प्रमोद सिंघवी, मंत्री अनुराग नाहर सहित कई पदाधिकारी एवं शहर के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रावक-श्राविकाएं मौजूद थे।
विहार मार्ग में जगह-जगह गुरूभक्तों ने किया समकितमुनिजी का अभिवादन
पूज्य समकितमुनिजी म.सा., भवान्तमुनिजी एवं जयवंतमुनिजी ने शनिवार सुबह श्याम विहार से यश सिद्ध स्वाध्याय भवन के लिए विहार किया तो मार्ग में जगह-जगह पहले से उनके दर्शनों के लिए खड़े श्रावक-श्राविकाओं ने अभिनंदन किया। इस दौरान मार्ग में यश विहार पहुंचने पर समकितमुनिजी ने वहां श्रीमद् भागवत गीता पर चल रहे तीन दिवसीय सेमिनार के बारे में जानकारी ली एवं मांगलिक प्रदान किया। इस दौरान सेमिनार आयोजकों की ओर से पूज्य मुनिवर को श्रीमद् भगवत गीता ग्रंथ की प्रति भेंट की गई। विहार यात्रा के दौरान श्रावक-श्राविकाएं भगवान महावीर स्वामी के जयकारे लगाते हुए चल रहे थे। सांगानेर रोड पर पहुंचते ही क्षेत्रवासी उनके आगमन के लिए पहुंच गए और पूरे भक्तिभाव के साथ उनका अभिवादन करते हुए प्रवास स्थल यश सिद्ध स्वाध्याय भवन तक लेकर आए।
दोपहर में श्रावकों से की धर्मचर्चा
यश सिद्ध स्वाध्याय भवन में प्रवास के दौरान पूज्य समकितमुनिजी म.सा. के दर्शनों के लिए दिनभर श्रावक-श्राविकाओं का आना बना रहा। चित्तौड़गढ़ से भी श्रावकगण उनके दर्शनों के लिए पहुंचे थे। पूज्य समकितमुनिजी म.सा. ने दोपहर में श्रावकों के साथ धर्मचर्चा भी की। इस दौरान एक सुश्रावक का जीवन किस तरह का होना चाहिए इस बारे में मुनिश्री ने प्रेरणा प्रदान करते हुए मार्गदर्शन भी दिया। उन्होंने कहा कि हम जिनशासन में जन्म तो प्राप्त हुआ लेकिन इसे सार्थक बनाने के लिए सच्चे श्रावक का जीवन जीकर दिखाना होगा। धर्मचर्चा में वरिष्ठ सुश्रावक भूपेन्द्र पगारिया, यश सिद्ध स्वाध्याय भवन श्रीसंघ के अध्यक्ष कैलाशचन्द्र बड़ौला, मंत्री मुकेश डांगी, श्रावक नरेन्द्र पीपाड़ा, महावीर कच्छारा आदि शामिल थे।
सन्मति वाटिका में मनाया जाएगा विशालमुनिजी का जन्मोत्सव
धन्यवाद यात्रा के तहत रविवार 13 नवंबर को भी समकितमुनिजी म.सा. आदि ठाणा का प्रवास सांगानेर रोड स्थित यश सिद्ध स्वाध्याय भवन में रहेगा। यश सिद्ध स्वाध्याय भवन के मंत्री मुकेश डांगी के अनुसार रविवार को उपाध्याय प्रवर वाचनाचार्य विशालमुनिजी म.सा. का 70वां जन्मोत्सव समकितमुनिजी म.सा. के सानिध्य में मनाया जाएगा। इस मौके पर प्रवचन सभा का आयोजन सुबह 9 बजे से यश सिद्ध स्वाध्याय भवन के नजदीक सन्मति वाटिका में किया जाएगा। भीलवाड़ा शहर में धन्यवाद यात्रा का समापन 14 नवंबर को सांगानेर स्थित कोठारी वाटिका में समकितमुनिजी के प्रवचन के साथ होंगा। सांगानेर श्रीसंघ के तत्वावधान में होने वाले आयोजन का लाभार्थी सुराणा परिवार होगा।

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