
रतलाम। पूज्य संयमी आत्माओं की प्रेरणा का संयोग मिलता है तब परिवारजन के सहज रूप में सहयोग के साथ हर किसी का अपनी शक्ति के अनुसार कोई न कोई तप करने का दृढ़ता पूर्वक मन हो ही जाता हैं। ऐसी ही प्रेरणा झाबुआ के आत्मोद्धार चातुर्मास में आचार्यश्री उमेशमुनिजी के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तकश्री जिनेंद्रमुनिजी, अणुवत्सश्री संयतमुनिजी, प्रवर्तकश्री के सांसारिक भाई जयंतमुनिजी, रतलाम गौरव अमृतमुनिजी, रतलाम गौरव सुहासमुनिजी एवं श्री सुलभमुनिजी ठाणा 6 से 17 वर्षीय प्रियल घोड़ावत को मिली। बालिका ने चातुर्मास प्रारंभ दिवस 13 जुलाई से ही निरंतर एकासन तप करना प्रारंभ कर दिया था।
चार माह प्रत्याख्यान लेने वाली एक मात्र प्रियल
व्याख्यान में प्रत्याख्यान के दौरान पूरे चार माह नियमित रूप से तप के प्रत्याख्यान लेने वाली एक मात्र प्रियल ही थी। समय समय पर प्रवर्तक श्रीजी एवं अणुवत्स श्रीजी ठाणा 6 से तप में आगे बढ़ने के लिए बालिका को प्रेरणा के साथ संबल मिलता रहा और तप में आगे बढ़ते बढ़ते निरंतर 125 एकासन तप कर संघ में एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया।
दिन में एक बैठक पर एक ही बार भोजन आदि ग्रहण करते है
गौरतलब बात यह है कि वैसे अन्य समाज में एकासन तप में एक समय भोजन करने के अलावा दिन में फलाहार आदि भी किया जाता है। लेकिन वहीं जैन धर्म के एकासन तप में दिन में एक ही बैठक पर एक ही बार भोजन, चाय, दूध आदि ग्रहण किया जाता है। इसमें पानी भी सूर्योदय के 48 मिनिट बाद से सूर्यास्त के पूर्व तक ही ग्रहण करते है।
प्रवर्तकश्रीजी के बाल सखा की दोयती है
तपस्वी प्रियल, धर्मदास गण नायक, प्रवर्तकश्री जिनेंद्रमुनिजी के सांसारिक बाल सखा एवं पारणा समिति रतलाम के संयोजक प्रकाशचंद्र नांदेचा की दोयती है। वहीं जैन समाज झाबुआ के वरिष्ठ एवं कल्याणपुरा श्रीसंघ के पूर्व अध्यक्ष श्री जयंतीलालजी घोड़ावत की पोती एवं जैन सोश्यल ग्रुप झाबुआ के पूर्व सचिव श्री अनूपजी – सौ. रेणुजी घोड़ावत की बेटी है।
परिवार का मिला अभूतपूर्व सहयोग
उक्त तपस्या में माता पिता के साथ पूरे परिवार का अभूतपूर्व सहयोग मिला। इसी के परिणाम स्वरूप यह तप पूर्ण किया जाना सार्थक हुआ। वहीं बालिका ने पूज्य गुरु भगवंतो के नियमित दर्शन, वंदन, व्याख्यान श्रवण, प्रतिक्रमण करना एवं धार्मिक ज्ञानार्जन के अलावा कॉलेज की पढ़ाई पर भी ध्यान दिया। झाबुआ श्रीसंघ एवं रतलाम श्रीसंघ सहित सभी ने तप की अनुमोदना करते हुए प्रियल का उक्त तप उनके लिए मंगलकारी एवं आत्म कल्याण में कर्म निर्जरा का हेतू बनने की मंगल कामना करते है।