बड़ीसादड़ी (राज.) सुनील मेहता ” कान्हा”)

इसलिए कई भ्रांतियां फैली हैं । सीधासा अर्थ है कि विवाह संबंधी अधिनियम में भेदभाव मिटाकर सभी जातियों-सर्वधर्मावलंबियों के लिए एक पति-एक पत्नी अर्थात एकल विवाह पद्धति लागू हो । अभी धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव चल रहा है जो अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत वर्जित है वह मिट जाएगा । इसमें आया है कि राज्य (राज्य सत्ता) धर्म, जाति, लिंग, वंष और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा । सभी के लिए समान कानून होगा ।
‘नागरिक’ शब्द से भ्रांति हुई । मनुष्यों के पारस्परिक अनेक व्यवहार दो प्रकृतियों के होते हैं । यदि नागरिक आपराधिक कार्य प्रवृत्ति करता है तो दांडिक न्यायालय उसे आपराधिक कानून या अधिनियम (क्रिमिनल कोड) के अन्तर्गत निर्णय कर दंड देता है । कारागृह की सजा होती है । इसके स्थान पर किसी भी संयुक्त कुटुम्ब या परिवार की आन्तरित व्यवस्था, वैवाहिक संबंध, पैतृक या कौटुम्बिक सम्पत्ति का बंटवारा, उत्तराधिकार, संतान अवयस्क है तब तक उसका संरक्षण एवं भरणपोषण, पालन कौन करेगा, संरक्षक कौन होगा, यदि किसी दम्पत्ति के पुत्र नहीं जन्मा, तब वह किसी अन्य दम्पत्ति (माता-पिता) के पुत्र को दत्तक ले सकता है, वही उसका उत्तराधिकारी होगा, वह दत्तक उन दत्तक माता-पिता की सगे माता-पिता जैसी सेवा करेगा, व्यवसाय, व्यापार, लेन-देन सहित वाणिज्य-व्यापार संबंधी विवाद आदि दीवानी प्रकृति के होते हैं । (सिविलनेचर के)
अभी आपराधिक मामले, मसले, विवाद सभी भारतवासियों के लिए एक समान आपराधिक नियम कायदे अधिनियम (सभी को क्रिमिनल कोड मानें) के अनुसार ही निर्णीत होते हैं । मुसलमानों के क्रिमिनल कोड (षरियत) के अनुसार नहीं होते । सभी जाति या धर्मावलंबियों पर एक जैसा, समान कानून लागू होते हैं ।
पति की मृत्यु पर पत्नी भी जीवित पति के शरीर के साथ जल जाती थी । सतीप्रथा, कुप्रथा मानी गई । मिटाया । कोई पत्नी चाहे अल्पवयकी है, विधवा हो जाए तो पुनर्विवाह, नाता नहीं होता था । जीवनपर्यन्त वैधन्य भोगो । पुनर्विवाह मान्य हुआ । कोई एक पुरूष कितनी ही कन्याओं से विवाह कर सकता था । युद्धों में पति मर जाएं, हजारों-लाखों के पालन-पोषण के लिए सामाजिक पारिवारिक सुव्यवस्था कन्याओं के जन्म अधिक संख्या में होते थे अतः एक पुरूष अनेक कन्याओं स्त्रियों से विवाह कर सकता था । हिन्दुओं में भी था। ये सभी व्यावहारिक संबंधों की सुचारू व्यवस्था के लिए थे । सुधारवादी युग आया ।
हिन्दु जिनमें बौद्ध, जैन और सिखों को भी सम्मिलित मानकर संसद ने चार अधिनियम पारित किए । (1) हिन्दु उत्तराधिकारी अधिनियम 1956 (2) हिन्दु विवाह अधिनियम 1956 (3) हिन्दु दत्तक अधिनियम और (4) हिन्दु अवयस्क पालन पोषण-संरक्षण अधिनियम आदि अति प्राचीनकाल से चली आ रही, बहु पत्नी विवाह पद्धति को अमान्य कर एक पति$एक पत्नी, एकल विवाह पद्धति लागू की गई । ईस्लाम धर्मावलिंबियों पर लागू नहीं की गई ।
संविधान के भाग चार में संविधान-सभा के सांसदों ने कुछ मौलिक (मूलभूत) अधिकार तो संविधान सभा ने ही दे दिए । ऐसे ही मौलिक महत्वपूर्ण प्रकृति के नीति-निर्देषक-तत्वों पर अधिनियम बनाने के लिए संसद पर परमकत्र्तव्य भारा डाला। उन मौलिक तत्वों (विषयों) में से एक है ‘यूनीफाॅर्म सिविल कोड’, मुख्य बिन्दु होगा, विवाह संबंधी अधिनियम इस्लाम धर्मावलंबियों पर भी लागू किया जाए । एक पति$एक पत्नी
इसका अर्थ यह नहीं होगा कि हिन्दुओं में सप्तपदी होती है तो मुसलमानों में भी हो । उनका निकाह, अपने-अपने मुल्ला, मौलवी उनकी पद्धति से करें । हिन्दुओं में किसी वधु का क्रय-विक्रय नहीं होता था, नहीं होता है । रीति रिवाज सबके अपने-अपने होंगे । ऐसा न माना जाए कि कोई भूचाल आ गया है ।
संसद के दो सदनों में से राज्य सभा को गरिमामय स्थान, उच्च सदन के सम्मान से सम्मानित किया है । इसके सदस्य सीधे मतदाताओं से नहीं चुने जाते हैं । राज्यों की विधान सभाएं चयन करके भेजती हैं । विषिष्ट योग्यता वाले बारह सदस्य महामहिम राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं । संख्या 250 तक सीमित कर दी गई । गंभीर एवं जटिल समस्याओं के हल के लिए गंभीरता से गहन चिंतन के बाद कोई अधिनियम पारित किया जाता है । इस उच्च सदन के विषेषज्ञ सदस्य किसी गंभीर विषय पर ‘शोध करके’ उक्त बिन्दु पर गहनता से विचार विमर्ष करके नवनीत निकालते हैं, इस उच्च सदन के सभापति पदेन उपराष्ट्रपति होते हैं ।
गरिमामय ऐसे सदन में ‘हंगामें’ मेरे जैसे विधि एवं संविधान विषेषज्ञ को आष्चर्य, खेद जन्य लगता है । राज्य सत्ता के तीन अंगे हैं – विधान निर्मात्री अंग (1) कार्यपालिका (2) न्यायपालिका तीनों अंगों में पारस्परित समन्वय के साथ एक-दूसरे अंग का एक दूसरे पर नियंत्रण के साथ न्यायपालिका की सर्वाेंपरिता कभी लगता है, संसद की सर्वाेपरिता है, कभी लगता है, प्रधानमंत्री की सर्वाेपारिता है, कभी लगता है, सदन की सर्वाेंपरिता कभी लगता है आपवादिक-आपातकालीन स्थिति में राष्ट्रपति की सर्वाेपरिता है। ऐसा उत्कृष्टतम संविधान है, इसी की पवित्रता, महत्ता, सर्वाेपरिता को बनाए रखें अन्यथा होगी अराजकता ।
इस लघु लेख के लेखक का परिचय:-
उदय मुनि, एम.काॅम, एलएल, एम, शोधनिदेषक
साहित्यरत्न, साहित्याचार्य, जैन सिद्धान्त प्रभाकर
गहन तात्विक नौ ग्रंथों का लेखन-व्याख्याकार एव विषिष्ट शोध ग्रंथ
पूर्व में:- विधि आचार्य प्राचार्य
अध्यक्ष विधि अध्ययनपर्षद,
विधि संकायाध्यक्ष विक्रम वि.वि.
आयु स्थिति 86 की पूर्णता पर । जन्म 16 मार्च 1937
दीक्षा काल 21वां वर्ष