- प्रो . निजामुद्दीन ( इस्लामिया कालेज श्री नगर)
- प्रस्तुति : विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा( पूणे)
जैन दिवाकर मुनि श्री चौथमल जी महाराज ने अत्मिक धर्म के उत्कर्ष के लिये राष्ट्रधर्म को अपनाने पर विशेष बल दिया ! एक योग्य नागरिक के नाते राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करना ही राष्ट्रधर्म हे और राष्ट्रधर्म को भलीभांती परिपालन करने वाले ही अध्यात्म धर्म को- आत्मिक धर्म को अंगीकार कर सकते हे ! जो व्यक्ति राष्ट्रधर्म का अनुपालन नंही कर सकता वह आत्मिक धर्म का आचरण भी नही कर सकता ! सामाजिक पर्वो को भी उन्होंने राष्ट्रधर्म व आत्मिक धर्म की उन्नती में महत्वपूर्ण माना हे ! उन्ही के शब्दो में- राखी का कोरा धागा बांधने से काम नही चलेगा! अगर रक्षा बंधन को वास्तविक रूप देना हे तो भाइ, भाइ की रक्षा करे, पड़ौसी की, गांव- नगर की, राष्ट्र की रक्षा करे ! जैसे दिपावली पर मकान का कूड़ा – कचरा साफ करते हो ओर उसे साफ सुथरा बनाते हो, इस ही प्रकार आत्मा को भी, अपने चित्त को भी निर्मल स्वच्छ बनाओ! आत्मा को शुद्ध करो ! अन्तरतल में घूसे अन्धकार को नष्ट करने का भी उद्योग करो, भीतर की मलिनता को हटाओ!
अहिंसा- ज्योति का प्रसार
श्री जैन दिवाकरजी महाराज के अहिंसा- प्रसार को । एतिहासिक परिपेक्ष्य में देखना समाचीन होगा ! संभवत: इस शताब्दी में अंहिसा का प्रचार-प्रसार जितना मुनि श्री ने किया उतना अन्य किसी महापुरुष ने नही किया ! विज्ञान ने सब कुछ दिया परन्तु लोगो की सुबुद्धी में तनिक भी परिष्कार व उन्नती नही हुई! मनुष्य आज भी हिंसक पशु बना! हुआ हे! हिंसा में अशांती की ज्वाला छिपी हुई ! उन्होंने अनेक स्थानो पर अंहिसा व जीवदया पर मार्मिक भाषण दिये जिनसे प्रभावित होकर अनेक लोगो ने हिंसा का, शिकार करने का, मांसाहार का परित्याग कर दिया था! उदयपुर , अलवर, जोधपुर, शिकारपुर, किशन गढ, करेड़ा, ताल, घटियावली, कोशीथल आदि जगहो के नरेशो , ठाकुरों ने हिंसा का परित्याग किया था !
संवत 1980 में इन्दोर में उनका सारगर्भित भाषण सुनकर नजर मोहम्मद कसाइ ने जीव – हत्या का त्याग कर दिया ! पालनपुर ( गुजरात) के नवाब सर शेर मोहम्मद खां बहादुर ने मुनिवर की धर्म चर्चा सुनकर , उन्हे एक दुशाला भेट करना चाहा, इस दान के बदले में उनसे अंहिसा का दान मुनिजी ने मांगा और इसके बाद नवाब साहब ने मांस – शराब को त्याग किया ! रतलाम और देवास तथा बनेड़ा आदि नरेशो – ठाकुरो ने उनके प्रवचनो से प्रभावित होकर जीवदया के सरकुलर निकाले! सन 1935 में उदयपुर के महाराणा फतह सिंह जी व भूपाल सिंह जी ने अंहिसा- प्रेम को अपनाया !
विदेशी प्रशंसक
जैन दिवाकर जी महाराज के समता , उदारता , निस्पृहता, मित्रता , सहिष्णुता, सत्यवादिता, कर्तव्यनिष्ठा, धर्मनिष्ठा, सच्चरित्रता का उपदेश सुनकर कुछ विदेशी भी काफी प्रभावित हुए! उदयपुर के रेवेन्यु कमिश्नर चेनेविम्स ट्रंच उनके बहुत प्रशंसक थे ! ट्रेंच साहब के नौकर ने मुनि श्री के प्रवचन सुनकर बुरी आदते छोड़ दी थी ! नेत्र विशेषज्ञ डाक्टर होमरस पारसी जावरा में प्रतिदिन उनका प्रवचन सुनते थे ! अंग्रेजी चीफ कमाण्डर ने तो अण्डो का सेवन ही छोड़ दिया था ! चितौड़ में अफीम विभाग के आफीसर एम. जी. टेलर उनके प्रवचनो से विशेष प्रभावित थे ! जैनधर्म के बारे में उन्होने कहाथा कि: मेरा यह विश्वास हे कि यह धर्म भोग प्रदान होता तो मोक्ष की ओर लेजाने वाला नंही होता ! संसार से मुक्ति चाहने वाले मनुष्य को जैन धर्म की शरण लेनी पड़ेगी !
स्वातंत्र्योत्तर भारत के नव निर्माण में भौतिक समृद्धी के उपादानो पर ही हम ध्यान केन्द्रित किये हे ! बाह्य सुख साधनो के जुटाने में खुन- पसीना बहा रहे है , लेकिन भीतर से तोड़ रहे है- निष्प्राण बना रहे हे! आज का मनुष्य मिस्र की ताबुत में रखी ममी बनकर रह गया है ! परिग्रहो के व्यामोह बढ़ते जारहे हैं, अंहकार का विषधर फुंकार रहा हे ! यह मान्य हे कि भौतिक समृद्धि राष्ट्र का शरीर हे, लेकिन बिना आत्मा के शरीर का क्या महत्व! आध्यात्मिक समृद्धीवहीन भौतिक समृद्धी आत्म – प्रवंचना के अतिरिक्त कुछ नही ! अमेरिका आदि भौतिक सम्पन्न देश कितने अशान्त, व्याकुल , तनावग्रस्त हे, यह सभी जानते हे! *मुनि श्री ने हमे भौतिक समृद्धि के साथ आत्म समृद्धि का व्यहवारिक ज्ञान प्रदान किया ! हमारे नैतिक संस्कारो को प्रबुद्ध किया! किसी स्थूल योजना को साकारित करना सरल कार्य हे, परन्तु नैतिक तथा चारित्रिक अमूर्त योजना को मूर्तरूप देना श्री चौथमल जी जैसे युग पुरुष का ही कार्य था!
( साभार महामानवता वादी युग पुरुष सन्त पुस्तक के अन्तर्गत , युग पुरुष जैन दिवाकर जो कि प्रोफेसर निजामुद्दीन ( इस्लामिया कालेज श्री नगर) द्वारा गुरुदेव जैन दिवाकर जी के पुरे जीवन का अध्ययन कर यह बताया कि युग पुरुष कौन होता हे वह सभी गुण , जैन दिवाकर श्री चौथमल जी महाराज में विद्यमान थे )
यह लेख पढ़कर उपाध्याय प्रवर कवि केवल मुनि जी द्वारा एक अमर गीत की पंक्तिये याद आजाती हे!
जैन जैनेतर आज उनके लिये रोते हे
सेंकड़ो वर्षो में कभी एसे साधु होते हे
अग्रदूत संघ एक्य योजना के प्राण थे
बड़े पुण्यवान थे जी बड़े पुण्यवान थे
जैन दिवाकर गुरुदेव ज्योति मान थे
पुण्यवान थे जी बड़े पुण्यवान थे!
उनके चरणों में अनन्त नमन – वंदन