आचार्य विशोकानंद भारती ने कहा – आत्मकल्याण के लिए प्रेय नहीं, श्रेय का मार्ग अपनाएं

रतलाम 14 अगस्त । स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत गुरुवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय तथा सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। कथा एवं प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
प्रवचन में आचार्य महामंडलेश्वर विशोकानंद जी भारती ने कहा कि सनातन की मूल चेतना आत्मज्ञान में निहित है और ‘शिवोऽहम्’ उसका बोध कराने वाला महत्वपूर्ण सूत्र है। उन्होंने कहा कि भक्ति केवल बाहरी प्रदर्शन या कुछ समय के लिए भाव-विभोर होने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि साधक को आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कथा और भक्ति के स्वरूप में कई स्थानों पर आडंबर बढ़ गया है। भक्ति का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को भीतर से संस्कारित करना और परमात्मा से जोड़ना है।
आचार्यश्री ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए हुआ। उन्होंने समाज में बढ़ते वैचारिक मतभेदों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने मूल आध्यात्मिक स्वरूप को पहचानने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सनातन की चेतना किसी एक कालखंड या सीमित भूभाग तक बंधी हुई नहीं है, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के प्रतीक विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में भी दिखाई देते हैं।

प्रेय और श्रेय में अंतर समझना जरूरी
कठोपनिषद के संदर्भ में आचार्यश्री ने प्रेय और श्रेय का विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य के सामने जीवन में हमेशा दो मार्ग होते हैं। प्रेय वह है जो तत्काल सुख और आकर्षण देता है, जबकि श्रेय वह मार्ग है जो मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति और आत्मकल्याण की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि परिवार, संसार और सांसारिक सुख-सुविधाएं प्रेय के क्षेत्र में आती हैं, जबकि आत्मिक उन्नति के लिए किया गया पुरुषार्थ श्रेय का मार्ग है। मनुष्य को दोनों के बीच विवेकपूर्वक चयन करना चाहिए।

राजनीति और सामाजिक जीवन में विवेक आवश्यक
सायंकालीन श्रीमद्भागवत कथा में आचार्यश्री ने राजनीति और सामाजिक जीवन में विवेक की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को किसी भी व्यक्ति अथवा व्यवस्था पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए। सामाजिक संबंधों में भी विवेक, मर्यादा और संस्कार आवश्यक हैं।
उन्होंने वर्तमान सामाजिक परिवेश में बदलती पारिवारिक सोच पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में विवाह और परिवार केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं, बल्कि संस्कार और जिम्मेदारी की व्यवस्था भी है। उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा और जीवनशैली के प्रभाव में पारंपरिक संस्कारों को कमजोर नहीं होने देना चाहिए।

गुरुकुल शिक्षा से संस्कार और ज्ञान का विकास
आचार्य महामंडलेश्वर ने गुरुकुल परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी लंबे समय तक गुरु के सानिध्य में रहकर शिक्षा, अनुशासन, संस्कार और जीवन-मूल्यों का ज्ञान प्राप्त करता था। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को विद्वान, संस्कारी और विवेकशील बनाना होना चाहिए।

नारद ऋषि के प्रसंग से आत्मकल्याण का संदेश
प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने देवर्षि नारद से संबंधित प्रसंग सुनाते हुए कहा कि बाल्यावस्था में ही नारद ने संतों के सानिध्य से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। जीवन में आई परिस्थितियों ने उन्हें संसार से विरक्ति और परमात्मा की ओर उन्मुख किया। इसी साधना और ज्ञान के परिणामस्वरूप वे आगे चलकर देवर्षि नारद के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि मनुष्य को अपने जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। आत्मकल्याण के लिए साधना, सत्संग, स्वाध्याय और विवेक का मार्ग अपनाना चाहिए।

प्रवचन के पश्चात आरती की गई तथा श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की गई। इस अवसर पर आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु, भक्त, महिलाएं एवं पुरुष उपस्थित रहे।

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