लेखक -प्रो.डी.के.शर्मा
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जोशीमठ में जो लोग भुगत रहे है उनकी त्रासदी से हम सब अवगत हैं। पिछले काफी वर्शो से पहाड़ो मे कई ह्रदय विदारक त्रासदी हुई सरकार उनका तात्कालिक समाधान निकालती है और कुछ समय बाद नागरिक और सरकार सब भुल जाते है। यह समस्या नई नहीं है। यह करीब 50 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई गतिविधि का परिणाम हैं। तब आधुनिक विकास के नाम पर वनों और पहाड़ो से दुश्मनी प्रारम्भ की तब से पहाड़ो पर विनाश की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। हजारों वर्ष पुराने पेड़ काटे जाने लगे और नदियों पर बांध बनाए जाने लगे। परिणाम स्वरूप पहाड़ गंजे और असुरक्षित हो गये है। तब सुन्दर लाल बहुगुणा जैसे प्रकृति प्रेमियों ने इस विनाशकारी गतिविधि के परिणामों का अदांज लगा लिया था। पूरा विश्व जानता है कि उनके नेतृत्व में पेड़ो को बचाने के लिए चिपको आन्दोलन स्थानिय लोगांे ने चलाया था। जब पेड़ काटे जाते थे तब वहां रहने वाले स्त्री पुरूष उन पेड़ो पर चिपक कर उनको कटने से बचाने का प्रयास करते थे। इसे चिपको आन्दोलन के नाम से जाना जाता है। र्दुभाग्य से यह बहुत सफल नहीं हो पाया। इसका दुश्परिणाम पहाड़ और पहाड़ पर रहने वाले लोग तो भुगत ही रहे हैं, पूरा देश भी भुगतेगा इसमें जरा भी शंसय नहीं है।
ऐसा लगता है आधुनिक विकास प्रकृति का दुश्मन है। हमंे याद रखना होगा कि आधुनिक विकास सुख सुविधंाए दे सकता है परन्तु जीवन नहीं दे सकता। जीवन को सुरक्षा भी प्रकृति ही प्रदान करती है और इंसान है कि प्रकृति का दुश्मन बना जा रहा है। आज तक हिमालय की पहाड़ियों से लाखों पेड़ काटे जा चुके है। वहां नियमित जाने वाले लोग बताते हैं कि हिमालय रंेन्ज के अधिकतर पहाड़ अब गंजे हो चुके हैं। लाखो पेड़ कटने से पहाड़ो का तापमान बढ़ने लगा है और वहां जमी बर्फ कम होने लगी है। सभी जानते है कि वहां जमी बर्फ ही उत्तर भारत की प्रमुख नदियों का उद्गम स्थान है। पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक सावधान कर ही चुके है कि उत्तर भारत की अधिकतर नदियां सुख जाएगी। इसमें गंगा और यमुना भी शामिल है। पेड़ ना होंगे तो बर्फ ना होगी, बर्फ ना होगी तो नदियां ना होगी, और नदियां ना होगी तो खेती ना होगी, और खेती ना होगी तो जीवन ना होगा।
यही हाल देश के अन्य भागो का भी है। हमारे मालवा पठार के सभी पहाड़ पहाड़ियां गंजे हो चुके हैं। किसी जमाने में घने जंगलो से ढंके आदिवासी क्षेत्र झाबुआ मालवा के पहाड़ी इलाको का भी यहीं हाल है। हमारे अपने गांव से भी लाखो पेड़ गायब होते हमने भी देखा है। वहां से निकलने में दिन में भी डर लगता था अब वहां सुरज की चमचमाती रोशनी दिखाई देती है। यही हाल पूरे देश का है। आबादी बढ़ रही है और जीवन को सुरक्षित रखने वाले जंगल कम हो रहे है। पेड़ो की वजह से छोटे छोटे नदी नाले भी वर्ष भर बहते रहते थे वे अब बरसात के एक दो माह बाद ही सुख जाते है। मालवा की गंगा चंबल का बहाव भी वर्षा के एक दो माह बाद बंद हो जाता है। विकास के लिए सड़के बनाई जाती हैं ,लाखो पेड़ काटे जाते हैं और नए पेड़ कोई नहीं लगाता। पहाड़ांे पर बिजली बनाने के लिए अनेक बांध बनाए जा रहे है।क इनमें एकत्रित पानी पहाड़ो में रिस कर विनाश करता है। केदारनाथ त्रासदी को बहुत वर्ष नहीं हुए हैं। प्रकृति से दुश्मनी इंसान को बहुत मंहगी पड़ने वाली है।
पूरी दुनिया का यही हाल है। युरोप में आल्प्स पर्वत की चोटियां सर्दी में भी बिना बर्फ के दिखाई दे रही हैं। वही अमेरिका जैसे कई देश बर्फिले तुफानों से बर्बाद हो रहे है। दक्षिणी अमेरिका के भी कई देश वातावरण असंतुलन का परिणाम भुगत रहे हैं। अमेजॉन के प्रसिद्ध जंगल 30प्रतिशत कम हो गए हैं। प्रकृति ने पेड़ मनुष्य के जीवन के लिए बनाए। पेड़ अपनी जड़ो से पृथ्वी और पहाड़ो को बांधे रखते है। परन्तु मनुष्य सब बर्बाद करने पर तुला हुआ है। अंतरिक्ष में आसियाना ढूंढने पर असीमित धन खर्च कर रहा है और पृथ्वी को बर्बाद करने पर तुला हुआ है। जब तक हम पेड़ो से प्रेम नहीं करेंगे विनाश होता रहेगा और किसी दिन मनुष्य का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।