साभार – जैनदिवाकर ज्योतिपुंज खंड 2/ 30
सुरेंद्र मारु
मेरे गुरु महाराज पधारे हैं। यह जानकर दस दफा दर्शन करने दौड़ोगे और जब जानोगे कि दूसरे संप्रदाय के मुनि आए हैं तो एक बार उनकी सूरत देखने भी नहीं जाओगे।यह सब क्या है?इस भेदभाव की जड़ में सिवाय ममत्व के और क्या है? मोक्षमार्ग के आराधक को गुणों का आराधक होना चाहिए।जिस किसीभी व्यक्ति में साधु के गुण हों उसको साधु समझना चाहिए।उसे गुरु मानना चाहिए।मगर जैसे संपत्ति का बंट वारा कर लिया है।जो साधु अमुक संप्रदाय में हों वे तुम्हारे गुरु हैं और जो दूसरे संप्रदाय में हों,वे तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं हैं। फिर चाहे ज्ञान और चारित्र में वे कितने ही ऊंचे क्यों न हों ?यह क्षुद्र ममता है।यह कषाय है।मोक्ष मार्ग के पथिक को सद्गुणों की पूजा करना चाहिए।जो साधु वीतराग प्रभु की आज्ञा में विचरते हों औरअपनी मर्यादाका भलीभांति पालन करते हों,उन सबको अपना गुरु मानो। गुरूओं का बंटवारा मत करो।आप प्रतिक्रमण सूत्र का पाठ हमेशा बोलते हैं- अरिहंतो महदेवो, जावज्जीवाएसुसाहुणो गुरुणो। जैन धर्म की उदार शिक्षा पाकर भी मन में इतनी संकीर्णता क्यों ? क्यों ? क्यों?