जैन दिवाकर वाणी-धर्म का आधार समाज

साभार : जैन दिवाकर ज्योतिपुंज खंड 3/ 340
प्रवचांश :जैन दिवाकर पूज्य गुरुदेव श्री चौथमल जी म.सा.
प्रस्तुति : सुरेन्द्र मारू

भाइयों ! धर्म का आधार समाज है।समाज सुव्यवस्थित होगातो धर्म का पालन यथोचित रूपसे होसकता है।अगर समाज ही विश्रंखल हुआतो धर्मका पालन होना कठिनहो जायेगा ।इसी दृष्टिकोणसे धर्मोपदेशकों कोभी समाज की स्थिति पर विचार करना पड़ता है और सामाजिक स्थिति को सुधारने की प्रेरणा कर नी पड़ती है।उपेक्षा और अव्यवस्था समाज का घुन है, जो समाज को कुतर -कुतर कर खोखला कर देगा। अतएव आपको धर्म की रक्षा के लिए अपनी सामाजिक स्थिति का सावधानी के साथ अवलोकन करना चाहिए।जहां कहीं त्रुटियां दिखलाई दे,वहां सुधार करना चाहिए। सच्चे धर्म-प्रेम का तकाजा है कि उस धर्म के अनुयायियों से भी प्रेम किया जाय। अगर आप इस नीति पर चलेंगे और धर्मात्माओं के प्रति वात्सल्य की भावना रखेंगे तो आपका समाज भी सुव्यवस्थित रहेगा। * *होकर मनुष्य मनुष्य की करते अगर दया नहीं। फिर कहां रही मनुष्यता, कहती है दुनिया यही।