तपस्वी मधुबाला चौपड़ा का तेले की तपस्या के साथ संथारा पूर्वक राजपुर में देवलोकगमन

  • डोल यात्रा में लोगों ने बड़ी संख्या में शामिल होकर संथारे की अनुमोदना की
  • रतलाम श्री पार्श्वनाथ जैन मित्र मंडल ट्रस्ट के अध्यक्ष की भतीजी थी

रतलाम । श्रीवर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ राजपुर के अध्यक्ष, समाजसेवी, अणु भक्त भागचंद चौपड़ा की धर्म सहायिका तपस्वी “मधुबाला चौपड़ा” का राजपुर (बड़वानी) में तेले की तपस्या के साथ संथारा सहित देवलोकगमन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ्य होने के कारण तेले की तपस्या के दौरान परिवारजन की उपस्थिति में उन्हें संथारा के प्रत्याख्यान ग्रहण करवाए गए थे। प्रत्याख्यान के करीब ढाई घंटे बाद संथारा आराधिका का देवलोकगमन हो गया। यह सूचना मिलते ही समूचे राजपुर जैन समाज एवं अन्य समाज सहित उक्त क्षेत्र से बड़ी संख्या में जनसमुदाय संथारा आराधिका के दर्शन हेतु उनके राजपुर निवास पर पहुंचा। वे अमित चौपड़ा की माताजी एवं बखतगढ़ जैन समाज के प्रसिद्ध अनाज व्यापारी स्वर्गीय मांगीलाल दरड़ा की बेटी तथा रतलाम टीआईटी रोड़ श्री पार्श्वनाथ जैन मित्र मंडल ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रकाशचंद्र दरड़ा, जयंतीलाल दरड़ा की चचेरी भतीजी, बखतगढ़ के व्यापारी श्रेणिक दरड़ा, भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत शाखा प्रबंधक संतोष दरड़ा इंदौर, किराना व्यापारी राजेंद्र दरड़ा इंदौर, चार्टर्ड अकाउंटेंट सुनील दरड़ा मुंबई की बहन एवं रतलाम के रमेशचंद्र दरड़ा, मूर्ति पूजक युवक महासंघ के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेंद्र दरड़ा, नरेंद्र दरड़ा, सुशील दरड़ा की चचेरी बहन थी। बैंड बाजे एवं श्रमण भगवान महावीर स्वामीजी व जिनशासन गौरव आचार्यश्री उमेशमुनिजी ‘अणु’ के जयकारों के साथ उनकी डोल यात्रा निकाली गई। इसमें जैन समाज के अलावा विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों एवं सदस्यों सहित बड़ी संख्या में जन समुदाय शामिल हुआ। संथारा आराधिका ने जीवन में कई तप आराधनाएं की। इसमें मासक्षमण, आयंबिल, एकासन आदि सहित कई छोटी बड़ी तपाराधनाएं शामिल हैं। अर्थात उन्होंने अपने जीवन को पूर्ण रूप से धर्ममय के साथ तपमय भी बना लिया था।
क्या है संथारा आराधना
‘संथारा’ मृत्यु को निकट जानकर अपनाए जाने वाली जैन परंपरा की एक उत्कृष्ट आराधना है। इसमें जब व्यक्ति को लगता है कि वह मृत्यु के करीब है तो वह किसी जैन संत – सतीजी से अथवा स्वयं या किसी से संथारा ग्रहण कर अन्न, जल आदि सभी का त्याग कर देता है। जैन साधना पद्धति में इस परंपरा को ‘संथारा’ कहा जाता है। जैन परंपरा के अनुसार संथारे का बहुत ही सटिक एवं प्रामाणिक महत्व दर्शाया गया है। यह आराधना संयमी आत्माओं एवं श्रावक -श्राविकाओं दोनों के लिए बताई गई है। इसे जीवन की अंतिम साधना भी कहा गया हैं। इसके आधार पर व्यक्ति मृत्यु को पास देखकर सब कुछ त्याग देता है। इस आराधना से जीव को अच्छी गति (भव) मिलती है।

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