- साभार – जैनदिवाकर ज्योतिपुंज खंड 4/ 398 प्रवचांश
- जैन दिवाकर पूज्य गुरुदेव श्री चौथमलजी म सा
- प्रस्तुति : सुरेन्द्र मारू
भाइयों! विचार कर वाणी का प्रयोग करो। वाक्य -बाण बड़े तीक्ष्ण होते हैं। सुनने वाले के हृदय में बुरी तरह चुभते हैं। बाण तो क्षणिक दु:ख देता है और शूल भी दीर्घकाल तक कष्ट नहीं पहुंचाता; किंतु वचन -बाण हृदय में चुभने के पश्चात जीवन पर्यंत सालते ही रहते हैं। उनका निकलना बड़ा मुश्किल होता है। कभी-कभी तो वे जन्म -जन्मांतर में भी वैर की परंपरा को जारी रखते हैं, अतएव कभी हृदय में उत्तेजना उत्पन्न हो जाय और क्रोध आ जाय तो उस समय मौन धारण कर लेना ही उचित है। उसी समय सीमंधर स्वामी का या अपने गुरुजी का स्मरण करके मौन धारण करने की प्रतिज्ञा ले लो। ऐसा करोगे तो बहुत – से संकटों से बच जाओगे।