जैन परंपरा के अनुसार अहंकार मे भेदभाव पूर्ण व्यव्हार करना दुर्भाग्य पूर्ण प्रणाली है समाज की एकता मे बाधक है चिंताओं का विषय है

अशोक मेहता, इंदौर (जैन एकता समन्वयक)

पर्यूषण पर्व मनाएंगे क्षमा विरस्य भूषणम् कहेंगे अहिंसा परमो धर्म मानेंगे। परंतु सबसे ज्यादा विरोधाभास, विरोध और द्वेष हमारे बीच ही फैला हुआ है। पहले सिर्फ जैन धर्म कहलाता था दिगंबर जैन और श्वेतांबर जैन धर्म अलग-अलग कहलाने लगे।
श्वेतांबर जैन में फिर बटवारा हुआ मंदिर मार्गी श्वेतांबर जैन और स्थानकवासी श्वेतांबर जैन के रूप में अलग-अलग पहचान बनाने में लगे। बात यहीं नहीं रुकी स्थानकवासी श्वेतांबर जैन श्रमण संघ और साधुमार्गी संघ में बढ़ गए। और यह बंटवारा आगे और इतना बढ़ गया कि अलग-अलग आचार्य के साथ अलग-अलग मान्यता वाला समाज बनता जा रहा है। खाई इतनी गहरी हो चुकी है की यह सभी अलग-अलग मान्यता वाले संत एक साथ एक छत के नीचे कभी नहीं रहे जबकि पर्यूषण पर्व मनाते हैं क्षमा विरस्य भूषणम् की बात कहते हैं अहिंसा की बात करते हैं एकता संभाव की बात करेंगे परंतु अपने मान्यता और अपनी समाचारी को ही सर्वश्रेष्ठ कहेंगे और ऐसे सभी साधु संत और आचार्य के कहने पर अंधभक्त श्रावक लोग दिन प्रतिदिन अलग-अलग जैन तबके में टूटते जा रहे हैं।
आचार्य कहते हैं श्रावक अपनी मर्जी से यह सब करते हैं तो आचार्य जी आपने श्रावक को ऐसा करने से रोका क्यों नहीं। आज समाज की यह हालत है की भगवान महावीर से पहले आचार्य गुरु की वंदना होने लगी है।

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