आप पाली से है व पूरे परिवार ने एक साथ 2014 मे संयम ग्रहण किया था

भानपुरा । संसारी नाम …. मनोज डाकलिया
जन्म – मेरू तेरस संवत 2033 सोमवार, दिनांक 17-01-1977
जन्म स्थान – ब्यावर
पिता – गौतमचंद डाकलिया
माता – श्रीमती ललिता डाकलिया
भाई – जितेन्द्र डाकलिया
पढ़ाई – एम कॉम
व्यवस्था – कपड़े का
पत्नी : सुश्राविका मोनिकाजी वर्तमान में साद्वी श्री विरतिशाश्रीजी
पुत्र : भव्य वर्तमान में मुनि श्री भव्यमुनि
पुत्री : कुमारी खुशी वर्तमान में साध्वी श्री विनम्रयशाश्रीजी
दीक्षा : वैशाख सुद 2 संवत 2070 गुरूवार दिनांक 01-05-2014
स्थान : पाली (राजस्थान)
बड़ी दीक्षा : आषाढ़ वदि 9 संवत 2070 शनिवार दिनांक 21-06-2014
स्थान : नवरंगपुर दादावाड़ी, अहमदाबाद
गुरूदेव : प.पू. पन्यास श्री कुशलमुनिजी म.सा.
नामकरण : मुनिश्री विरागमुनिजी म.सा.
अतित के झरोखे से
पाली राजस्थान के इतिहास में पहली बार हुआ था जिसमें पूरे परिवार ने दीक्षा ग्रहण कर संयमी बना हो । करोड़ों रूपए की अचल सम्पत्ति, सालाना चार करोड़ रपए का कपड़े का व्यवसाय और भरा-पूरा परिवार छोड़कर सन्यास का निर्णय वह भी महज बत्तीस वर्ष की उम्र में । यह निर्णय पाली निवासी मनोज डाकलिया ने लिया था एवं उनसे भी बड़ा निर्णय उनकी तीस वर्षीय पत्नी का था जिन्होंने सभी सुख-सुविधाएं छोड़कर संयम पथ पर जाने का फैसला किया था । यहां तक भी ठीक थाना परन्तु डाकलिया दम्पत्ती की दो संतानों ने भी माता-पिता की राह पर चल पड़ी। उस समय बेटा मात्र आठ वर्ष का और संसारी नाम भव्य, जैसा नाम वैसा ही निर्णय और बेटी खुशी की उम्र बारह वर्ष वह भी ठीक अपने नाम की तरह खुशी से उस राह पर चल पड़ी थी जो बड़े-बड़े संयमी लोगों के लिए सहज नहीं था । इस पूरे परिवार ने 1 मई 2014 के दिन दीक्षा ग्रहण कर संयमी बना । श्री मनोज डाकलिया ने दस वर्ष पूर्व अपने गुरू जयानंद महाराज की प्रेरणा से ही संयम पथ पर चलने का संकल्प ले लिया था । साल 2003 में प्रथम उपधान तप की आराधना पूज्य श्री की निश्रा में की थी । इसके बाद वे अपना सांसरिक जीवन भले ही जीते रहे लेकिन लगातार दीक्षा की इच्छा प्रबल होती गई । 2004 में दुसरा उपधयान किया । परिजनों व परिचितों ने खुब समझाया, पर मन में एक ही लक्ष्य बस संयम की राह अपनाने का । उनके इस निर्णय में पहले पत्नि मोनिका शामिल हुई, फिर बेटी और अंत में बेटा । बचपन से ही घर में धर्म-कर्म का माहौल ही बना रहा । माताजी का भी धर्म के प्रति अटूट पे्रम रहा । गुजरात कटला पाली राजस्थान निवासी परिवार के छोटे भाई जितेन्द्र अमेरिका में एक कम्पनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है सपरिवार में अमेरिका में रहते है ।
मनोजजी भरा-पूरा परिवार और करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक थे । मूलत: ब्यावर के रहने वाले थे । ब्यावर में आज भी उनका पैतृक मकान है । वहां उनके परिजन रहते है । दीक्षा के पैंतीस वर्, पूर्व व्यवसाय के लिए परिवार पाली में आकर बस गया था । यहां बड़े से मकान में रहे और बाजार में एक दुकान भी थी। दीक्षा की तारिख तय होने के पूर्व ही मनोज जी ने अपना कपड़े का धंधा बंद कर दिया था । वह अब केवल अपने परिवरा के साथ प्रभु के ध्यान में एक-एक क्षण बिताते ते । शादी से पहले ही वे संयम पथ धारण करने का विचार बना चुके थे। लेकिन सगाई हो गई और फिर शादी । उनकी पत्नि भी सगाई के बाद से दीक्षा का निर्णय कर चुकी थी। लेकिन उस समय तक उन्हें योग्य गुरू नहीं मिले थे । इनका परिवार जैन संत जयानंद मुनिजी, साध्वी अनुभवश्री और प्रभाश्री के आभारी रहे । जिनकी प्रेरणा से उन्होंने संयम पथ पर चलने का निर्णय लिया था। परन्तु दीक्षा के पहले ही गुरूदेव श्री जयानंद मुनिजी का कालधर्म हो गया था । उन्ही के शिष्य परम पूज्य गणाधीश पन्यास प्रवर श्री विनयकुशलमुनिजी$ के चरणों में जीवन समर्पित कर मुमुक्षु मनोज से बने मुनि श्री विरागमुनिजी उनके संसारी सुपुत्र मुमुक्षु भव्य मुनिजी भव्यमुनिजी बने, धर्मपत्नि मुमुुक्षु रत्ना मोनिका से साध्वी श्री विरतियशाश्रीजी बने, संसारी सुपुत्री मुमुमुक्षु खुशी से साध्वीश्री विनम्रयशाश्रीजी बने । पाली संघ ने बहुत ही उत्साह पूर्वक दीक्षा प्रसंग में चार चांद लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। पाली नगर की पुण्य धरा पर मुमुक्षु मनोज मोनिा, खुशी, भव्य डाकलिया सकुटुम्ब परमेश्वरी प्रवज्या प्रसंग पर अष्टान्हिका समिति, पाली मारवाड़ ने किया था पावन निश्रा परम पूज्य सासन प्रभावक प.पू. श्री जयानंदमुनिजी म.सा. के शिष्य रत्न प.पू.श्री कुशलमुनिजी म.सा. की निश्रा में सम्पन्न हुए ।
दीक्षा निमित्त अलग-अलग कार्यक्रम इस प्रकार से हुए थे ।
प्रथम दिन दिनांक 25-04-2014 शुक्रवार के दिन डोरा बंधन, रात्री भक्ति का कार्यक्रम हुआ था ।
द्वितीय दिवस 26-04-2014 शनिवार के दिन श्री पाश्र्वनाथ पंच कल्याणक पूजा, भक्ति संध्या का आयोजन किया गया था।
तृतीय दिवस 27-04-2014 रविवार के दिन अरिंहत वंदनावली, मातृ-पितृ वंदना, भावना आचार्य का आयोजन किया गया था ।
चतुर्थ दिवस 28-04-2014 सोमवार के दिन श्री नवपद पूजा, श्री शत्रुंजयतीर्थ भावयात्रा, रात्रीभक्ति का आयोजन हुआ था।
पंचम दिवस 29-04-2014 मंगलवार के दिन श्री संघ मिच्छामि दुक्कड़म का कार्यक्रम हुआ था ।
षष्टम दिवस 30-04-2014 बुधवार के दिन वर्षीदान वरघोड़ा निकला जो बहुत ही भव्य रहा, तत्पश्चात मेहंदी, गांव सांझी, मायरा एवं विदाई समारोह का आयोजन किया गया था ।
सप्तम दिवस 01-05-2014 गुरूवार बर्हत्थाल (वीरथाल) महाअभिष्क्रण यात्रा, दीक्षा की मंगल विधि प्रारम्भ हुआ था।
अष्टम दिवस 02-05-2014 शुक्रवार के दिन नूतन दीक्षार्थियों का चतुर्विध श्रीसंघ सहित सांसरिक गृह आंगन में पगले हुए थे।
सभी कार्यक्रम जयानंद भक्ति मंडप, अनुव्रत नगर पाली में हुए थे। इन सभी कार्यक्रम में भक्ति करवाने हेतु भारत वर्ष से विभिन्न कलाकार पधारे थे जिसमें मुख्य अनिल गेमावत, बाल कलाकार सौरभ डोशी, चैन्नई लवेश, बुरड, संजय भाई भाऊ, मोहनजी गुलेच्छा चैन्नई आदि पधारे थे।
वर्तमान- महातपस्वी, तप चक्रवती बनने तक की यात्रा पूज्य गुरूदेव श्री विरागमुनिजी की तपस्या ।
जीवन की झांकी
पूज्य श्री ने अपने संसारी जीवन से ही तपोमय बनाने की शुरूआत वर्ष 2003 से की थी । प्रथम उपध्यान, दुसरा उपधयान किया । विशेष तपस्या इस प्रकार से की जिसकी जानकारी नीचे निम्नलिखित है ।
वर्षीतप तीन बार : – (1) उपवास पारणा (2) उपवास पारणा (3) उपवास पारणा ।
इस तरह से 16 उपवास तक लगातार करके पारणा किया।
मासक्षमण एक बार, सिद्धी तप एक बार
दस महिनों तक छठ के पारणे छठ किए जिसके प्रथम चरण में 67 छठ और द्वितीय चरण में 34 छठ के पारणे छठ किए।
10 उपवास – एक बार । 11 उपवास एक बार । अ_ाई – तीन बार ।
वर्तमान में पूज्य गुरूदेव ने दिं. 11 जून 2023 को करीब 140 दिनो पहले उपवास तप का प्रारम्भ किया था जो दिं. 13 जून 2023 तक करीब 150 तप उपवास पूर्ण हो चुके है और अभी निरंतर चालु है अपने विशेप संकल्प के पूर्ण होने तक । आप की इस उग्र तपस्या को देखते हुए परम पूज्य खरतर गच्छाधिपति आचार्य श्री मणिप्रभसागरजी ने आप को चप चक्रवर्ती के विरूद्ध से अलंकृत किया । साथ में उन्होंने बताया कि सम्पूर्ण 1000 वर्षो की खरतरगच्छ की ज्ञात जानकरी में इतना दीर्घ तप पहले किसी ने नहीं किया है ।
देवलोक जिनालय पालीताणा के सभी एडमिन टीम और पेज से जुड़े 2,83,000 से भी अधिक सदस्य आप के तपोवन जीवन की बार-बार अनुमोदना करते है । आप दीर्घ आयुष्य वाले बने और स्वस्थ रहे और इसी प्रकार से जिनशासन के शिखर को शोभायमान करे । 29 जून को बालाघाट में चातुर्मास हेतु प्रवेश है और प्रतिदिन लगभग 10 से 15 किलोमीटर पैदल विहार हो रहा है साथ ही साधु जीवन के नित्य क्रिया अनवरत नियमानुसार जारी है मात्र 10 वर्ष के साधु जीवन में जैन श्वेताम्बर समाज के हजारों साधु संतो में अपनी उग्र तपस्या में भी सहज भाव नजर आता है चेहरे का तेज उनका उनको महावीर के पथ पर अग्रणी दिखाता है परम पूज्य विरागमुनिजी जो आगम सूत्र के ज्ञाता है बिना किसी आडंबर आरम सारम के अपनी उग्र तपस्या में लीन है, भारत देश में पूरे जैन समाज को विरागमुनिजी की इतनी बड़ी तपस्या को लेकर चिंतित है स्वास्थ्य को लेकर कारण यह कि 45 डिग्री तापमान और 150 दिन से बिना कुछ खाए पीना रहना और उसमें भी पैदल विहार कर बालाघाट पहुंचना व नित्य क्रिया साधु जीवन की अनवरत करना, पूरे देश में श्री संघो में विराग मुनि की तपस्या पूर्म अभिग्रह फले इसके लिए पूजा-अर्चना नवकार मंच के जाप जारी है सभी आचार्यगणों संत गणों ने भी विरागमुनिजी के तप की अनुमोदना करते हुए अभिग्रह जल्दी से जल्दी फले इसके लिए अपनी साधना कर रहे है ।