गुरू पुष्टि देते है, तुष्टि देते है, संतुष्टि देते है-आचार्यश्री विजयराजजी मसा

रतलाम,03 जुलाई। गुरू जीवन में अति महत्वपूर्ण है। वे मनुष्य के जीवन में तीन काम करते है, एक पुष्टि देते है, दूसरा तुष्टि देते है और तीसरा संतुष्टि भी देते है। ये तीनों वरदान जिसे मिल जाते है, वह शिष्य, शिष्य नहीं रहता, अपितु गुरू बन जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में गुरू होना जरूरी है। गुरू बने बिना मुक्ति मिल सकती है, लेकिन शिष्य बने बिना मुक्ति नहीं मिलेगी।
यह बात परम पूज्य प्रज्ञा निधि युगपुरूष आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने गुरूपूर्णिमा के प्रवचन में कही। श्री हुक्मगच्छीय साधुमार्गी शान्त क्रांति जैन श्रावक संघ रतलाम द्वारा समता शीतल पैलेस छोटू भाई की बगीची में आयोजित धर्मसभा में उन्होंने कहा कि प्रत्येक शिष्य के चार सौभाग्य होते है। पहला गुरू को पाना, दूसरा गुरू को अपनाना, तीसरा गुरू में रम जाना और चैथा गुरू से बंध जाना है। संसार में कई लोग गुरू को पाते है, लेकिन अपना नहीं पाते, जो अपनाते है, वे उनका अनुसरण नहीं कर पाते और अनुसरण करते है, तो पूरी तरफ समर्पित नहीं होते। गुरूपूर्णिमा पर सभी गुरू के तीन वरदान पुष्टि, तुष्टि और संतुष्टि पाने का संकल्प लेकर आगे बढेंगे, तभी यह महापर्व मनाना सार्थक होगा।
आरंभ में उपाध्याय, प्रज्ञारत्न श्री जितेशमुनिजी मसा ने गुरू की महिमा का वर्णन किया। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भी संबोधित किया। आचार्यश्री की प्रेरणा से कई गुरूभक्तों ने तप, त्याग और तपस्या के प्रत्याख्यान लिए। संचालन हर्षित कांठेड द्वारा किया गया।