रतलाम । सम्यक दर्शन के बाद दृष्टिकोण ही अलग हो जाता है सम्यक दर्शी व्यक्ति ही सम्यक ज्ञान सम्यक तप सम्यक चरित्र की ओर आगे बढ़ सकता है मिथ्यात्व शून्य के समान है जो कीतना भी तप कर ले वह स्वयं को वहीं खड़ा पाएगा ऐसे ही समयक दृष्टि व्यक्ति जीवो को समझता है वह शून्य के आगे लगे एक के समान है जो शून्य की कीमत को बढ़ा देता है मिथ्या में पड़े व्यक्ति को विवेक की समझ नहीं होती वह तो सिर्फ करता चला जाता है करोड़ों साल की तपस्या भी उसकी व्यर्थ चली जाती है वह सभी चीजों को ऊपरी आभा से देखता है सम्यक दर्शन वाला व्यक्ति आंतरिक भावो को , सूक्ष्म जीवो को , पाप पुण्य को समझता है, जिनेश्वर देवकी आज्ञा में चलने वाला होता है, हिंसा को धर्म मानना इसका लक्षण नहीं है अहिंसा प्रेमी होता है वह जीवन चलाने के लिए कार्य करता है उसकी किसी भी वस्तु विशेष पर आसक्ति नहीं होती ईश्वर के अनुसार सम्यक दृष्टि पाप करता ही नहीं है उनका सोचने का तरीका अलग होता है उनके मानस में चीजें स्पष्ट होती है वह बारीकी से हर बात को देखते हैं उपरोक्त बात प्रवचन में राम महिमा महोत्सव के अंतर्गत शासन दीपक सुमित मुनि जी महाराज साहब ने फरमाई। जानकारी देते हुए श्री साधुमार्गी जैन संघ के प्रीतेश गादिया ने बताया कि कल के प्रवचन का विषय संडे इस फंडे रहेगा इस अवसर पर साधुमार्गी जैन संघ के अध्यक्ष श्री सुदर्शन जी पीरोदिया ने आगामी धार्मिक शिविरों की जानकारी प्रेषित की सभा का संचालन मंत्री दशरथ बाफना ने किया।