परिवर्तन का रास्ता ही प्रवचन है – आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

रतलाम, 12 जुलाई। हमे प्रभु के वचनों को सुनना भी है, गाना भी है और अपने अंदर परिवर्तन लाना भी है। परिवर्तन का रास्ता ही प्रवचन है। यह बात सैलाना वालों की हवेली मोहन टाॅकीज में प्रवचन के दौरान आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने कही।
आचार्य श्री ने मनुष्य की तीन क्रियाओं- श्रवण क्रिया, श्रवण कला और श्रवण योग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि कुछ भी सुनते समय हमारा मन भटकता है तो वह श्रवण क्रिया होती है। यदि किसी बात को एकाग्रता से सुनते है तो वह श्रवण कला कहलाती है। इसी प्रकार यदि कोई बात आपके कान सुन रहे है और वह मन में जा रही है और आप उसे मान भी रहे है, तो इसे श्रवण योग कहते है।
आचार्य श्री ने कहा कि कोई भी कार्य पांच कारणों से तारण, कर्म, पुरूषार्थ, स्वभाव और भविद्वता के बिना अनुकुल हुए नहीं हो सकता। लोग भी दो प्रकार के होते है, लोहे और लकडे़ जैसे। जिन्हे वचन की आग नहीं बदलेगी वह लोेहे जैसे है और जिनमें परिवर्तन आ जाएगा, वह लकडे़ जैसे है। अनंत प्रभु के वचन मिले तो सुनने में देर नहीं करना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि पैसे से पानी का मूल्य ज्यादा है। पानी से कई ज्यादा मूल्य वाणी का है। पानी के चार गुण- प्यास बुझाना, आग बुझाना, मेल मिटाना और काली मिट्टी में जाकर बीज से फसल उगाना है। यहीं चार गुण वाणी में भी है। प्रभु के वचन हमारी तृष्णा मिटाते है। अंहकार को मिटाने की ताकत रखते है। भीतर की भूमि पर परमात्मा की वाणी की बारिश हो जाए तो निर्मलता पैदा होती है। प्रवचन के दौरान श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी रतलाम के सदस्य एवं बढ़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।