सुख के भिखारी नहीं, दुख का भागीदार बनो-आचार्य श्री विजयराज जी मसा

छोटू भाई की बगीची में प्रवचन

रतलाम,16 जुलाई। महापुरूषांे ने कहा है-दुखी, सुखी हो सकता है, लेकिन दुख देने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता। इसलिए सुख के दाता बनो, सुख देने वाले सदैव सुखी रहते है। दुख के दाता तो दुखी के दुखी रहते है। जीवन में कभी ये मत भूलों कि सुख बांटने से बढता है और दुख बटोरने से कम होता है।
यह बात परम पूज्य प्रज्ञा निधि युगपुरूष आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। छोटू भाई की बगीची में रविवार के विशेष प्रवचन के दौरान उन्होंने जीव में आनंद समझाते हुए कहा कि दुख बटोरोगे और सुख बांटोगे, तो जीवन आनंदमय हो जाएगा। प्रकृति का भी सिद्धांत है कि दुख देने वाले को दुख और सुख देने वाले को सुख मिलेगा। इसलिए जीवन में कभी सुख के भिखारी मत बनो, अपितु दुख के भागीदार बनो। इससे दुख कम होगा और मनुष्य जीवन सार्थक हो जाएगा।
आचार्यश्री ने उपस्थित श्रावक एवं श्राविकाओं से कहा कि संसार में कोई भी व्यक्ति सबकों सुखी नहीं बना सकता है, लेकिन किसी को दुखी नहीं करने का संकल्प प्रत्येक व्यक्ति पूरा कर सकता है। सुख बांटने वाला ही धनी, पुण्यशाली और भाग्यशाली होता है, इसलिए सदैव सुख बांटने का प्रयास ही करना चाहिए। आचार्यश्री ने इस मौके पर सुख-दुख पर भजन सुनाकर सबकांे भावविभोर कर दिया।
आरंभ में उपाध्याय, प्रज्ञारत्न श्री जितेशमुनिजी मसा ने बुजुर्गों को कुल का देवता बताया। उन्होंने कहा कि परिवार में माता-पिता, गुरूजन के अलावा सभी बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए। उनका अपमान पुण्य को खत्म करता है। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा एवं तपस्विनी, कवयित्री, विदुषी महासती श्री इन्दुप्रभाजी मसा ने भी संबोधित किया। आदर्श संयमरत्न श्री विशालप्रिय मुनिजी मसा ने श्रावक-श्राविकाओं से प्रवचनों पर आधारित रोचक प्रश्न किए। कई श्रावक-श्राविकाओं ने तपस्या के प्रत्याख्यान लिए। संचालन हर्षित कांठेड द्वारा किया गया।